व्याख्यान 247 (253 में से)

V. मुझे सिद्ध प्रेम के कुछ प्रभावों का उल्लेख करना है।

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V. मुझे सिद्ध प्रेम के कुछ प्रभावों का उल्लेख करना है।

1. परमेश्वर और मनुष्य के प्रति सिद्ध प्रेम का एक प्रभाव निश्चय ही यह होगा, कि परमेश्वर के राज्य के हितों को बढ़ाने और पापियों के उद्धार के लिये आत्म-त्याग करने में आनन्द आएगा।

स्नेही माता-पिता को देखिए, वे अपनी सन्तानों का सुख बढ़ाने के लिये आत्म-त्याग करने में कैसा आनन्द पाते हैं। वह एक पिता है; वह अपने परिवार की भलाई बढ़ाने के लिये, दिन-प्रतिदिन और वर्ष-प्रतिवर्ष, एक लम्बे जीवन भर, थका देनेवाले परिश्रम में अपने आप को लगा देता है, तड़के उठता है, और निरन्तर चिन्ता की रोटी खाता है। और वह इस सारे आत्म-त्याग और कठिन परिश्रम को दुःख या बोझ नहीं, वरन् आनन्द समझता है, क्योंकि वह अपने परिवार से प्रेम रखता है। उस माता को देखिए; वह अपने पुत्र को कॉलेज में पढ़ाना चाहती है, और अब, इसे कष्टदायक पाने के बजाय, उसकी सहायता के लिये देर रात तक जागना और लगातार परिश्रम करना उसके लिये आनन्द की बात है। यह इसलिये है कि वह सचमुच अपने पुत्र से प्रेम करती है। ऐसे माता-पिता स्वयं उन्हीं वस्तुओं का उपभोग करने की अपेक्षा अपनी सन्तानों को वे वस्तुएँ देने में अधिक आनन्दित होते हैं। कौन माता या पिता ऐसा है जिसे फल का एक टुकड़ा स्वयं खाने की अपेक्षा अपने छोटे बच्चे को देने में अधिक आनन्द न आता हो? प्रभु यीशु मसीह ने मनुष्यजाति के लिये उद्धार का कार्य पूरा करने में जितना ठोस सन्तोष पाया, उतना उसके पवित्र लोग उसके हाथों से अनुग्रह पाने में कभी नहीं पा सकते। उसने गवाही दी कि लेने से देना धन्य है। यही वह आनन्द था जो उसके आगे धरा था, जिसके लिये उसने लज्जा की कुछ चिन्ता न करके क्रूस का दुःख सहा।

मनुष्यजाति के प्रति उसका प्रेम इतना महान था कि उसने उसे इस कार्य को अपने हाथ में लेने के लिये विवश किया, और विजयपूर्वक उसमें से पार निकलने तक उसे सम्भाले रखा। प्रेरित पौलुस ने सुसमाचार फैलाने और आत्माओं का उद्धार करने के लिये एक स्थान से दूसरे स्थान तक खदेड़े जाने, बन्दीगृह में डाले जाने, कोड़े खाने, पथराव किए जाने, और सब वस्तुओं की खुरचन की नाईं गिने जाने को दुःख और कठिनाई नहीं समझा। वह उसका आनन्द था।

मसीह के प्रेम ने उसे ऐसा विवश कर दिया था, उसमें भलाई करने की ऐसी अभिलाषा थी, कि उस वेदी पर इस उद्देश्य के लिये अपने आप को बलिदान के रूप में चढ़ा देना उसका सबसे बड़ा आनन्द था। अन्य व्यक्तियों का मन भी प्रेरित के समान रहा है। ऐसे लोग देखे गए हैं जो एक हज़ार वर्ष तक, या समय के अन्त तक जीवित रहने को तैयार होते, यदि वे भलाई करने में, परमेश्वर के राज्य को बढ़ाने में, और मनुष्यों की आत्माओं का उद्धार करने में लगाए जा सकते, और जिन पात्रों से वे इतना अधिक प्रेम रखते हैं उनकी भलाई के लिये नींद और भोजन तक को छोड़ देने को तैयार रहते।

2. यह आत्मा को व्यवस्थावादी प्रेरणाओं की शक्ति से छुड़ा देता है। सिद्ध प्रेम किसी व्यक्ति को परमेश्वर की आज्ञा मानने की अगुवाई करता है, इसलिये नहीं कि वह परमेश्वर के क्रोध से डरता है, या यह या वह करने के लिये प्रतिफल पाने की आशा रखता है, वरन् इसलिये कि वह परमेश्वर से प्रेम रखता है और परमेश्वर की इच्छा पूरी करना उसे प्रिय है। इस विषय पर दो अतियाँ हैं। एक वर्ग सद्गुण को इसमें मानता है कि जो ठीक है वह केवल इसलिये किया जाए कि वह ठीक है, परमेश्वर की इच्छा का, या परमेश्वर की ओर से किसी प्रभाव का कोई विचार किए बिना। दूसरा वर्ग सद्गुण को इसमें मानता है कि काम उस काम के प्रति प्रेम से किया जाए, परन्तु शासक और व्यवस्था देनेवाले के रूप में परमेश्वर के अधिकार का कोई विचार किए बिना। ये दोनों भूल में हैं।

किसी काम को केवल इसलिये करना कि वह उसे ठीक समझता है, और परमेश्वर के प्रति प्रेम से नहीं, सद्गुण नहीं है।

न ही किसी काम को इसलिये करना सद्गुण है कि उसे वह काम करना प्रिय है, जबकि परमेश्वर की इच्छा का कोई ध्यान न हो। कोई स्त्री कुछ काम इसलिये कर सकती है कि वह जानती थी कि इससे उसका पति प्रसन्न होगा, परन्तु यदि वह वही काम केवल इसलिये करती कि उसे वह करना प्रिय था, और अपने पति का कोई ध्यान न रखती, तो

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