व्याख्यान 106 (253 में से)

इसी प्रकार जो व्यक्ति डाक-शुल्क के अठारह सेंट के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के राजकोष को ठगेगा,

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इसी प्रकार जो व्यक्ति डाक-शुल्क के अठारह सेंट के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के राजकोष को ठगेगा, उसमें इतना भी सिद्धान्त नहीं कि वह राजकोष को लूटने से रुक जाए, यदि उसे दण्ड से बच निकलने की वैसी ही आशा हो।

जिस सिद्धान्त ने उसे एक काम करने दिया, वही उसे दूसरा काम भी करने देगा। और जिस प्रेरणा ने उससे एक काम करवाया, वही उससे अवसर मिलने पर दूसरा काम भी करवाएगी, यदि कोई और उतनी ही स्वार्थी प्रेरणा उसका प्रतिरोध न करे।

इसी प्रकार कोई मनुष्य, जो सीधा-सीधा झूठ बोलने का साहस न करे, छोटी-छोटी ग़लतबयानियों का दोषी हो सकता है। तौभी यदि वह धोखा देने के उद्देश्य से, या तथ्यों को उनकी वास्तविकता से भिन्न दिखाने के उद्देश्य से, सत्य को रंगने और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने का दोषी है, तो वह वास्तव में झूठ बोल रहा है; और जो व्यक्ति ऐसा करेगा, वह चाहे जितने झूठ गढ़ लेगा, यदि यह उसके हित में हो, या यदि सत्य के प्रति पवित्र आदर के अलावा अन्य कारण उसे रोके न हों।

V. मैं कुछ ऐसे उदाहरण बताऊँगा जहाँ लोग छोटी बातों में बेईमान होते हैं, जबकि अधिक महत्त्व के मामलों में वे ईमानदारी से, वरन् भक्तिपूर्वक भी, काम करते दिखाई देते हैं।

1. हम प्रायः ऐसे व्यक्ति पाते हैं जो छोटे-छोटे क़र्ज़ चुकाने के विषय में सिद्धान्त का बड़ा अभाव प्रकट करते हैं, जबकि बैंक के ऋण-पत्रों के भुगतान में, और अपने सब व्यापारिक लेन-देन में, वे अत्यन्त सावधान और समय के पाबन्द होते हैं।

उदाहरण के लिए, एक मनुष्य कोई समाचार-पत्र मँगाता है, उसका दाम बहुत थोड़ा है, और प्रकाशक हर एक व्यक्ति के पास वसूली करनेवाला नहीं भेज सकता, इसलिए यह मनुष्य अपना चन्दा शायद वर्षों तक यों ही पड़ा रहने देता है, और शायद कभी चुकाता ही नहीं। यदि यही बैंक का ऋण-पत्र होता, तो यही व्यक्ति समय का पूरा पाबन्द रहता; और ऋण-पत्र को नियत दिन से आगे जाने देने के बदले वह कोई भी परिश्रम उठा न रखता।

क्यों? क्योंकि यदि वह बैंक में अपना ऋण-पत्र नहीं चुकाता, तो वह प्रोटेस्ट (अनादृत घोषित) हो जाएगा, और उसकी साख को हानि पहुँचेगी; परन्तु बीस शिलिंग या पाँच डॉलर का छोटा-सा क़र्ज़ प्रोटेस्ट नहीं होगा, और वह यह जानता है, और इसलिए वह उसे टलने देता है, और प्रकाशक को या तो उसे मँगवाने का कष्ट और ख़र्च उठाना पड़ता है, या अपने पैसे के बिना रहना पड़ता है। यह कितना स्पष्ट है कि यह मनुष्य बैंक में अपने ऋण-पत्र ईमानदारी के सिद्धान्त से नहीं, वरन् केवल अपनी साख और अपने हित के विचार से चुकाता है।

2. मैं पहले सिलाई करनेवाली स्त्रियों के उदाहरण का उल्लेख कर चुका हूँ। मान लीजिए कोई व्यक्ति अपने लिए सिलाई करने को स्त्रियों को काम पर रखता है, और उसी व्यापार के दूसरे लोगों से सस्ता बेचने के लिए वह इन स्त्रियों को ऐसे काम के उचित दाम से भी नीचे दबा देता है। यह स्पष्ट है कि वह व्यक्ति किसी भी बात में ईमानदार नहीं है। यदि अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए, या दूसरों से सस्ता बेचने के लिए, वह इन स्त्रियों का दाम नीचे दबाएगा, तो मान लीजिए कि वह अपने सार्वजनिक लेन-देन में प्रतिष्ठित और तत्पर है, इसमें उसकी कोई बड़ाई नहीं; यह इसलिए नहीं कि वह हृदय से ईमानदार है, वरन् इसलिए कि ऐसा दिखना उसके हित में है।

3. कुछ लोग छोटी-मोटी चोरियाँ करके सिद्धान्त का यह अभाव प्रकट करते हैं। यदि वे किसी ऐसे बोर्डिंग हाउस (भोजन-सहित आवास) में रहते हैं जहाँ और भी रहनेवाले हैं, तो वे छोटी-मोटी चोरियाँ करेंगे, शायद तहख़ाने में रखे ईंधन की। कोई व्यक्ति सवेरे अपनी आग सुलगाने के लिए अपने लिए थोड़ा-सा लकड़ी का कोयला लाने का ख़र्च नहीं उठाएगा, बल्कि दूसरों के जमा किए हुए भण्डार में से चुरा-चुराकर काम चलाता है,

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