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मेरे पास आकर पूछे, “उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूं?” और मैं उससे कहूँ, “यदि तुम उद्धार पाने की आशा रखते हो, तो तुम्हें उद्धार पाने से निराश होना होगा,” तो वह क्या सोचेगा? किस ईश्वर-प्रेरित लेखक ने कभी ऐसा कोई निर्देश दिया? नहीं, प्रेरणा-प्राप्त उत्तर यह है, “तू प्रभु अपने
परमेश्वर से अपने सारे मन से प्रेम रखना,” “मन फिराओ,” “सुसमाचार पर विश्वास करो,” इत्यादि। क्या यहाँ कोई ऐसी बात है जिसका अर्थ निराशा हो?
यह सच है कि पापी कभी-कभी सच्ची शान्ति पाने से पहले निराश हो जाते हैं। परन्तु इसका कारण क्या है? यह इसलिये नहीं कि सच्ची शान्ति के लिये निराशा आवश्यक है; परन्तु उनकी अज्ञानता के कारण, या उन्हें दी गई गलत शिक्षाओं के कारण, या सत्य को गलत समझने के कारण। बहुत से चिन्तित पापी इसलिये निराश हो जाते हैं कि उन्हें यह झूठी धारणा हो जाती है कि उन्होंने पाप करते-करते अपना अनुग्रह का दिन खो दिया है, या उन्होंने अक्षम्य पाप कर दिया है, या उनके पाप विशेष रूप से गम्भीर हैं, और सुसमाचार का प्रबन्ध उन तक नहीं पहुँचता। कभी-कभी वे इस कारण निराश होते हैं—वे जानते हैं कि दया का प्रबन्ध किया गया है, और जैसे ही वे शर्तें मानेंगे वह दिए जाने को तैयार है, परन्तु वे पाते हैं कि सच्चे समर्पण के उनके सारे प्रयत्न व्यर्थ हैं। वे पाते हैं कि वे इतने घमण्डी और हठीले हैं कि वे उद्धार की शर्तों के लिये अपनी ही सहमति नहीं जुटा पाते। कदाचित् अधिकांश व्यक्ति जो समर्पण करते हैं, वास्तव में ऐसी स्थिति पर पहुँचते हैं जहाँ वे सब कुछ खोया हुआ मान लेते हैं। परन्तु क्या यह आवश्यक है? यही प्रश्न है। अब, आप देखते हैं, उन्हें निराशा की ओर ले जानेवाली उनकी अपनी दुष्टता के सिवा और कुछ नहीं है। वे प्रस्तुत की गई दया को थामने के लिये इतने अनिच्छुक हैं। तो फिर, उनकी निराशा सुसमाचार के अधीन सच्चे समर्पण के लिये आवश्यक होने के बदले, उससे असंगत है, और किसी मनुष्य ने उस दशा में रहते हुए कभी सुसमाचार को ग्रहण नहीं किया। तब तो यह भयानक अविश्वास है, निराश होना पाप है; और यह कहना कि यह सच्चे समर्पण के लिये आवश्यक है, यह कहना है कि पाप सच्चे समर्पण के लिये आवश्यक है।
IV. सच्चा समर्पण परमेश्वर के सम्पूर्ण शासन में सहमति देना है।
यह उसके विधानमय शासन में, उसके नैतिक शासन में, उसकी व्यवस्था की आज्ञा में, और उसकी व्यवस्था के दण्ड में सहमति देना है, इस प्रकार कि वह अपने आप को दण्ड के अत्यन्त भारी और अनन्त बोझ के योग्य माने; और सुसमाचार में उद्धार की शर्तों के प्रति समर्पण है।
सुसमाचार के अधीन, नरकदण्ड पाने को तैयार रहना किसी मनुष्य का कर्तव्य नहीं है। नरकदण्ड पाने को तैयार रहना उसके कर्तव्य से पूरी तरह असंगत है। जो मनुष्य निरी व्यवस्था के आधीन होता है, और नरकदण्ड पाने के लिये सहमत हो जाता है, वह पहले जैसा ही विद्रोह में है; क्योंकि परमेश्वर की स्पष्ट माँगों में से एक यह है कि वह सुसमाचार का पालन करे।
V. किसी पापी से दण्ड पाने को तैयार होने के लिये कहना, कई कारणों से, एक बड़ी भूल है।
यह सुसमाचार को एक ओर रख देना है, और उसे उस शासन से भिन्न किसी दूसरे शासन के अधीन रखना है जो वास्तव में विद्यमान है। यह उसके सामने परमेश्वर के चरित्र का एक अधूरा चित्र रखता है, जिसके आधीन होने की उससे माँग की जाती है। यह समर्पण की सच्ची प्रेरणाओं को रोक रखता है। यह वास्तविक और सच्चे परमेश्वर को नहीं, वरन् एक भिन्न प्राणी को प्रस्तुत करता है। यह उसके साथ छल करना है, यह विचार सामने रखकर कि परमेश्वर उसके नरकदण्ड की इच्छा करता है, और उसे उसके आधीन होना होगा; जबकि परमेश्वर ने गम्भीर शपथ खाई है कि वह दुष्ट की मृत्यु नहीं चाहता, परन्तु यह चाहता है कि वह अपनी दुष्टता से फिरकर जीवित रहे। यह
