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समय लगे, तो आप देखेंगे कि वे बँटने लगते हैं। कुछ हिचकिचाते हैं; कुछ सन्देह करते हैं; कुछ आपत्तियाँ उठाते हैं; और कुछ दृढ़ता से इन्कार कर देते हैं। कुछ तुरन्त जुट जाते हैं, क्योंकि वे देखते हैं कि इससे बड़ी भलाई होगी। दूसरे तब तक पीछे खड़े रहते हैं जब तक आप उसके पक्ष में उनके स्वार्थ को उकसाने का कोई उपाय न निकालें। इस अन्तर का कारण क्या है? उनमें से कुछ अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं।
12. वे लोग इसी चरित्र के हैं जो धर्म की अपेक्षा दूसरे विषयों में अधिक रुचि रखते हैं।
यदि आप उन्हें दूसरे विषयों पर बात करने को अधिक तत्पर पाते हैं; उनसे अधिक सरलता से उत्तेजित होते, समाचार जानने के लिए अधिक जागरूक पाते हैं, तो वे अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं। कितनी भीड़ के लोग जागृतियों, मिशनों, या धर्म के हितों से सम्बन्धित किसी भी बात की अपेक्षा बैंक के प्रश्न, या युद्ध के प्रश्न, या आग के विषय, या सांसारिक प्रकृति की किसी भी बात से अधिक उत्तेजित होते हैं।
आप उन्हें राजनीति या सट्टे के विषय में पूरी तरह मग्न पाते हैं; परन्तु यदि आप धर्म का विषय छेड़ें, तो आह, वे उत्तेजना से डरते हैं! और पशु-भावनाओं की बातें करने लगते हैं! इससे यह प्रकट होता है कि धर्म वह विषय नहीं जो उनके हृदय के सबसे निकट है। मनुष्य उसी विषय पर सबसे सरलता से उत्तेजित होता है जो उसके हृदय के सबसे निकट होता है। उस विषय को छेड़िए, और वह रुचि लेने लगता है। जब आप सुबह से शाम तक समाचारों और दूसरे सांसारिक विषयों पर बात कर सकते हैं, और जब धर्म के विषय में आपकी किसी भी प्रकार रुचि नहीं जग सकती, तो आप जानते हैं कि आपका हृदय उसमें नहीं है; और यदि आप परमेश्वर का सेवक होने का दिखावा करते हैं, तो आप कपटी हैं।
13. जब लोग परमेश्वर की महिमा की अपेक्षा अपनी ख्याति के लिए अधिक जलन रखते हैं, तो यह दिखाता है कि वे अपने लिए जीते हैं, और अपने देवताओं की सेवा करते हैं।
आप किसी मनुष्य को परमेश्वर के विरुद्ध कही गई बातों की अपेक्षा अपने विरुद्ध कही गई बातों से अधिक चिढ़ते या दुःखी होते देखते हैं; वह किसकी सेवा करता है, उसका परमेश्वर कौन है, वह स्वयं या यहोवा? एक पादरी को देखिए जो इस कारण ज्वर में पड़ जाता है कि किसी ने उसकी विद्वत्ता, या उसकी प्रतिष्ठा, या उसकी अचूकता के विरुद्ध कोई अपमानजनक शब्द कह दिया, जबकि धन्य परमेश्वर पर किए गए सब अपमानों पर वह बर्फ़ की तरह ठंडा रहता है। क्या वह मनुष्य पौलुस का अनुयायी है, जो मसीह के लिए मूर्ख समझे जाने को तैयार था? क्या उस मनुष्य ने कभी धर्म का पहला पाठ भी सीखा? यदि सीखा होता, तो वह धर्म के लिए अपने नाम को बुरा जानकर काट दिए जाने पर आनन्दित होता। नहीं, वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहा; वह अपने देवताओं की सेवा कर रहा है।
14. वे लोग अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं जो प्राणों के उद्धार को अपने जीवन का महान और प्रमुख उद्देश्य नहीं बनाते।
सब धार्मिक संस्थाओं का लक्ष्य, वह जो उन सब को मूल्य देता है, पापियों का उद्धार है। वह लक्ष्य जिसके लिए मसीह जीवित है, और जिसके लिए उसने अपनी कलीसिया को संसार में छोड़ा है, पापियों का उद्धार है। यही वह काम है जिसमें परमेश्वर अपने सेवकों को लगाता है, और यदि कोई मनुष्य यह काम अपने काम के रूप में, अपने जीवन के प्रमुख और मुख्य उद्देश्य के रूप में नहीं कर रहा, तो वह यहोवा की सेवा नहीं कर रहा, वह अपने देवताओं की सेवा कर रहा है।
