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अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना, और परमेश्वर से और अपने पड़ोसी से अपने आप की अपेक्षा असीम रूप से कम प्रेम रखना।”
3. सुसमाचार को उलट देना होगा। यह कहने के स्थान पर कि “तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए करो,” उसे यों पढ़ा जाना चाहिए, “सब कुछ अपने सुख के लिए करो।” “जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा,” इसके स्थान पर हमें उसमें यह कहा हुआ मिलना चाहिए, “जो अपने प्राण को बचाने के लिए सर्वोपरि रूप से चिन्तित है, वह उसे बचाएगा; परन्तु जो परोपकारी है, और दूसरों की भलाई के लिए अपना प्राण खोने को तैयार है, वह उसे खोएगा।”
4. मनुष्यों के विवेक को ऐसा बदलना होगा कि वे स्वार्थ के पक्ष में गवाही दें, और निःस्वार्थ परोपकार जैसी हर बात को दोषी ठहराएँ और उसकी निन्दा करें।
5. सही तर्क-बुद्धि को ऐसा बनाना होगा कि वह वस्तुओं को उनके सापेक्ष मूल्य के अनुसार न तौले, वरन् यह निर्णय करे कि हमारा अपना छोटा-सा हित परमेश्वर और विश्व के सबसे बड़े हितों से अधिक मूल्यवान है।
6. सामान्य समझ को यह निर्णय करना पड़ेगा कि सच्ची देशभक्ति इसमें है कि हर मनुष्य सार्वजनिक भलाई के स्थान पर अपना ही हित खोजे, और हर एक अपने आप को जितना ऊँचा उठा सके, उठाने का प्रयत्न करे।
7. मनुष्य की बनावट को उलट देना होगा। यदि सर्वोपरि स्वार्थ सद्गुण है, तो मनुष्य की बनावट गलत बनाई गई। वह ऐसी बनाई गई है कि मनुष्य केवल परोपकारी होकर ही सुखी हो सकता है।
और यदि यह सिद्धान्त सत्य है कि धर्म अपने ही सुख को सर्वोच्च भलाई मानकर खोजने में है, तो मनुष्य में जितना अधिक धर्म होगा, वह उतना ही अधिक दुखी होगा।
8. और समाज के सारे ढाँचे को बदलना पड़ेगा। अभी तो ऐसा है कि समुदाय की भलाई इस बात पर निर्भर करती है कि हर व्यक्ति किस सीमा तक सार्वजनिक हित का ध्यान रखता है। और यदि यह सिद्धान्त ठहरता है, तो इसे ऐसा बदलना होगा कि सार्वजनिक भलाई तब सबसे अच्छी तरह बढ़े जब हर मनुष्य दूसरों के हितों की परवाह किए बिना अपने ही हित के लिए छीना-झपटी कर रहा हो।
9. संतों के अनुभव को उलट देना होगा। जैसा वे अब पाते हैं कि जितना अधिक परोपकार उनमें होता है, उतना ही अधिक धर्म और उतना ही अधिक सुख होता है, उसके स्थान पर उन्हें यह गवाही देनी चाहिए कि वे जितना अधिक अपनी ही भलाई को लक्ष्य बनाते हैं, उतना ही अधिक वे धर्म का और परमेश्वर की कृपा का आनन्द लेते हैं।
10. पश्चाताप न करनेवालों को यह गवाही देते हुए पाया जाना चाहिए कि वे सर्वोपरि स्वार्थ में सर्वोपरि रूप से सुखी हैं, और कि उन्हें उसमें सच्चा सुख मिलता है।
मैं इस प्रमाण को और आगे नहीं बढ़ाऊँगा; ऐसा करना खिलवाड़-सा लगेगा।
यदि प्रमाण जैसी कोई वस्तु पाई जा सकती है, तो यह पूरी तरह प्रमाणित हो गया है कि अपने ही सुख को सर्वोपरि लक्ष्य बनाना सच्चे धर्म के विपरीत है।
I. हम देखते हैं कि ऐसा क्यों है कि जबकि सब लोग सुख का पीछा कर रहे हैं, फिर भी इतने थोड़े उसे पाते हैं।
तथ्य स्पष्ट है। कारण यह है; मनुष्यजाति का अधिकांश भाग यह नहीं जानता कि सच्चा सुख किस बात में है, और वे उसे उसमें खोज रहे हैं जो उसे कभी दे ही नहीं सकता। वे उसे इसलिए नहीं पाते क्योंकि वे उसका पीछा कर रहे हैं। यदि वे मुड़कर पवित्रता का पीछा करें, तो सुख उनका पीछा करेगा। यदि वे निःस्वार्थ बन जाएँ, और अपने आप को
