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प्रेम खो देता है, फिर वह परीक्षा का शिकार हो जाता है, और इस प्रकार पाप में पड़ जाता है। परन्तु वह उससे प्रेम नहीं रखता; वह उसे सदा कड़वा लगता है; वह दुःखी रहता है और अपने आपको घर से दूर अनुभव करता है। सच है कि उस समय उसमें परमेश्वर का आत्मा नहीं होता, परमेश्वर का ऐसा कोई प्रेम क्रियाशील नहीं होता जो उसे पाप से रोके, परन्तु वह पाप से प्रेम नहीं रखता; पाप में वह दुःखी रहता है; वह अनुभव करता है कि वह एक अभागा है। वह कपटी से जितना भिन्न हो सकता है उतना भिन्न है। ऐसा व्यक्ति, जब वह परमेश्वर के प्रेम को छोड़ देता है, तो कुछ समय के लिए शरीर के विनाश के लिये शैतान को सौंपा जा सकता है, ताकि आत्मा उद्धार पाए; परन्तु वह फिर कभी पाप का वैसा आनन्द नहीं ले सकता जैसा वह पहले लेता था, और न संसार के सुख-विलासों में वैसा मगन हो सकता है जैसा वह कभी हो सकता था। वह फिर कभी कुटिलता को पानी की नाईं नहीं पी सकता। जब तक वह भटकता रहता है, तब तक वह अभागा ही रहता है।
यदि आज रात यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति है, तो आप इसे जानते हैं।
7. आप देखते हैं कि पाप के बोध में पड़े पापी अपने पापों को छोड़ने की प्रतिज्ञा करने से क्यों डरते हैं।
वे आपसे कहते हैं कि वे ऐसा करने की प्रतिज्ञा करने का साहस नहीं करते, क्योंकि उन्हें डर है कि वे अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर पाएँगे। कारण यहीं है। “वे पाप से प्रेम रखते हैं।” पियक्कड़ जानता है कि वह शराब से प्रेम रखता है, और यद्यपि वह अपनी प्रतिज्ञा निभाने और उससे दूर रहने के लिए विवश हो सकता है, फिर भी उसकी भूख अब भी उसकी लालसा करती रहती है। और पाप के बोध में पड़े पापी के साथ भी ऐसा ही है। वह अनुभव करता है कि वह पाप से प्रेम रखता है, कि पाप पर उसकी पकड़ कभी टूटी नहीं, और वह प्रतिज्ञा करने का साहस नहीं करता।
8. देखिए कि धर्म का अंगीकार करनेवाले कुछ लोग प्रतिज्ञा-पत्रों के इतने विरोधी क्यों हैं।
यह उसी सिद्धान्त पर है। वे अपने पापों से इतना प्रेम रखते हैं, और जानते हैं कि उनका हृदय उन्हें भोगने के लिए गिड़गिड़ाएगा, इसलिए वे उन्हें छोड़ने की प्रतिज्ञा करने से डरते हैं। इसी कारण बहुत-से लोग, जो अपने को मसीही समझने का दावा करते हैं, कलीसिया में सम्मिलित होने से इन्कार करते हैं। गुप्त कारण यह है कि वे अनुभव करते हैं कि उनका हृदय अब भी पाप के पीछे जा रहा है, और वे कलीसिया की वाचा के दायित्वों के अधीन आने का साहस नहीं करते। वे नहीं चाहते कि यदि वे पाप करें तो कलीसिया के अनुशासन के अधीन हों। वह मनुष्य जानता है कि वह कपटी है।
9. जिन पापियों में सांसारिक शोक है, वे अब देख सकते हैं कि कठिनाई कहाँ है, और उनका मन-परिवर्तन क्यों नहीं होता।
पाप के विषय में उनकी बौद्धिक समझ ऐसी हो सकती है कि यदि उनका हृदय भी उसके अनुरूप होता, तो वे मसीही होते। और शायद वे सोच रहे हैं कि यही सच्चा पश्चाताप है। परन्तु यदि वे सचमुच पाप को, और सब पाप को, छोड़ने के लिए तैयार होते, तो वे इसकी प्रतिज्ञा करने में, और सारे संसार को यह जानने देने में कि उन्होंने ऐसा किया है, हिचकिचाते नहीं। यदि यहाँ कोई ऐसे लोग हैं, तो मैं आपसे अभी कहता हूँ कि आगे आइए, और इन आसनों पर बैठ जाइए। यदि आप पाप छोड़ने के लिए तैयार हैं, तो आप ऐसा करने की प्रतिज्ञा करने के लिए भी तैयार हैं, और यह प्रकट होने देने के लिए भी तैयार हैं कि आपने ऐसा किया है। परन्तु यदि आप पाप के बोध का विरोध करते हैं, और जब आपकी समझ प्रकाशित होकर देख लेती है कि आपको क्या करना चाहिए, तब भी आपका मन आपके पापों के पीछे लगा रहता है, तो हे पापी, अपने सामने खड़े भविष्य को देखकर काँपिए! आपके सारे पाप-बोध आपके किसी काम न आएँगे। उनका विरोध करने के कारण वे आपको नरक में और भी गहरा डुबो देंगे।
