व्याख्यान 90 (253 में से)

वांछनीय या मोहक वस्तु जैसा दिखने के बजाय, वह ठीक उलटा दिखता है,

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वांछनीय या मोहक वस्तु जैसा दिखने के बजाय, वह ठीक उलटा दिखता है — अत्यन्त घिनौना और घृणित — और वह अपने आप पर चकित होता है कि उसने कभी ऐसी वस्तु की इच्छा कैसे की। पश्चाताप न करनेवाले पापी पाप को देखकर यह समझ सकते हैं कि वह उनका नाश कर देगा, क्योंकि परमेश्वर उन्हें उसके लिए दण्ड देगा; परन्तु, फिर भी, अपने आप में वह उन्हें वांछनीय ही लगता है; वे उससे प्रेम करते हैं; वे उसे अपनी जीभ के नीचे दबाए रखते हैं। यदि उसका अन्त सुख में हो सकता, तो वे उसे छोड़ने की बात कभी न सोचते।

परन्तु दूसरे के लिए बात भिन्न है; वह अपने आचरण को पूरी तरह घिनौना देखता है। वह उस पर पीछे दृष्टि डालता है, और पुकार उठता है, “मुझमें अमुक-अमुक बात कितनी घिनौनी, कितनी घृणित, कितनी नरक के योग्य थी।”

2. परमेश्वर के साथ पाप के सम्बन्ध की दृष्टि से पाप के चरित्र के विषय में विचार का परिवर्तन।

पापी यह नहीं समझते कि परमेश्वर पाप के लिए ऐसे भयानक दण्ड की धमकी क्यों देता है। वे स्वयं उससे इतना प्रेम करते हैं कि वे नहीं समझ पाते कि परमेश्वर उसे ऐसी दृष्टि से क्यों देखे कि उसे अनन्त दण्ड के योग्य समझे। जब उन्हें गहरा पाप का बोध होता है, तब वे उसे भिन्न रूप में देखते हैं, और जहाँ तक विचार की बात है, वे उसे उसी प्रकाश में देखते हैं जिसमें एक मसीही देखता है, और तब मसीही बनने के लिए उन्हें केवल भावना के अनुरूप परिवर्तन की आवश्यकता रह जाती है। बहुत से पापी परमेश्वर के साथ पाप के सम्बन्ध को ऐसा देखते हैं कि वह अनन्त मृत्यु के योग्य है, परन्तु उनका मन उनके विचारों के साथ नहीं चलता। नरक के दुष्टात्माओं और बुरी आत्माओं की यही दशा है। तो ध्यान दीजिए! विचार का परिवर्तन सच्चे पश्चाताप के लिए अनिवार्य है, और सदा उससे पहले आता है। विचार के पहले परिवर्तन के बिना मन कभी सच्चे पश्चाताप में परमेश्वर की ओर नहीं बढ़ता। पश्चाताप के बिना विचार का परिवर्तन हो सकता है, परन्तु विचार के परिवर्तन के बिना कोई सच्चा पश्चाताप नहीं हो सकता।

3. पाप की प्रवृत्तियों के विषय में विचार का परिवर्तन।

पहले पापी यह बात पूरी तरह अविश्वसनीय समझता है कि पाप की प्रवृत्तियाँ ऐसी हों कि वह अनन्त मृत्यु के योग्य ठहरे। तौभी, पश्चाताप के बिना भी इस विषय में उसके विचार पूरी तरह बदल सकते हैं, परन्तु यह असम्भव है कि कोई मनुष्य विचार के परिवर्तन के बिना सचमुच पश्चाताप करे। वह पाप को उसकी प्रवृत्ति में अपने लिए और दूसरे सब के लिए, प्राण और शरीर दोनों के लिए, इस समय और अनन्तकाल के लिए विनाशकारी देखता है, और विश्व में जो कुछ मनोहर और सुखमय है उस सब के विरुद्ध देखता है।

वह देखता है कि पाप अपनी प्रवृत्तियों में उसे और दूसरे सब को हानि पहुँचाने के लिए ही बना है, और कि इसका कोई उपाय नहीं सिवाय इसके कि सब उससे पूरी तरह दूर रहें। शैतान जानता है कि ऐसा ही है। और सम्भवतः इस मण्डली में अभी कुछ पापी हैं जो इसे जानते हैं।

4. पाप के दण्ड-योग्य होने के विषय में विचार का परिवर्तन।

जिस शब्द का अनुवाद पश्चाताप किया गया है, उसमें यह सब निहित है। उसका अर्थ है मन की दशा में ऐसा परिवर्तन जिसमें यह सब सम्मिलित हो। लापरवाह पापी में, पाप के दण्ड-योग्य होने के विषय में, इस जीवन के सम्बन्ध में भी, सही विचारों का लगभग अभाव होता है। मान लीजिए कि वह सिद्धान्त रूप में यह मान लेता है कि पाप अनन्त मृत्यु के योग्य है, तौभी वह इस पर विश्वास नहीं करता। यदि वह इस पर विश्वास करता, तो उसके लिए लापरवाह पापी बने रहना असम्भव होता। यदि वह समझता है कि वह ईमानदारी से यह विचार रखता है कि पाप सदा के लिए परमेश्वर के क्रोध के योग्य है, तो वह धोखे में है। परन्तु जो पापी सचमुच जागृत हुआ है और जिसे पाप का बोध हुआ है, उसे इसमें उतना भी सन्देह नहीं होता जितना परमेश्वर के अस्तित्व में। वह स्पष्ट देखता है कि

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