व्याख्यान 199 (253 में से)

वे पश्चाताप करें ही, या उससे प्रेम करें ही, जो इस बात पर विश्वास करने का कारण न हो कि वह चाहता है

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वे पश्चाताप करें ही, या उससे प्रेम करें ही, जो इस बात पर विश्वास करने का कारण न हो कि वह चाहता है कि वे उससे सिद्ध रूप से प्रेम करें? सचमुच विचित्र तर्क है! यह सिखाना कि एक स्थिति में वह इसे चाहता है, क्योंकि वह इसकी माँग करता है, और दूसरी स्थिति में वही निष्कर्ष स्वीकार न करना। कोई भी मनुष्य बाइबल से यह नहीं दिखा सकता कि परमेश्वर इस संसार में पूर्ण पवित्रीकरण की माँग नहीं करता, न यह कि वह उसे नहीं चाहता, न यह कि वह पवित्रीकरण की किसी भी मात्रा के समान ठीक उतना ही प्राप्य नहीं है।

मैंने विशेष रूप से इसी बात को ध्यान में रखकर बाइबल को उलटा-पलटा है, और सोचा था कि अपने कार्ड पर, जिस पर मेरे प्रवचन की रूपरेखा है, उन खण्डों को लिख लूँ जो यह सिद्धान्त सिखाते हैं। परन्तु मैंने पाया कि वे इतने अधिक हैं कि ऐसा करना सम्भव ही नहीं, और यदि मैं उन सबको एकत्र करता, तो आज शाम मैं खड़े होकर पवित्रशास्त्र के खण्ड पढ़ने के सिवाय और कुछ न करता। यदि आपने इस दृष्टि से बाइबल को कभी नहीं देखा है, तो आप यह देखकर चकित होंगे कि पाप करने से छुटकारे के विषय में बोलनेवाले खण्ड, पाप के दण्ड से छुटकारे के विषय में बोलनेवाले खण्डों से कितने अधिक हैं। जो खण्ड केवल दण्ड से छुटकारे की बात करते हैं, वे दूसरों की तुलना में कुछ भी नहीं हैं।

2. परमेश्वर की वे सब प्रतिज्ञाएँ और भविष्यद्वाणियाँ जो इस संसार में विश्वासियों के पवित्रीकरण से सम्बन्ध रखती हैं, स्वाभाविक रूप से उनके पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में ही समझी जानी चाहिए।

पवित्रीकरण पवित्रता के सिवाय और क्या है? जब कोई भविष्यद्वाणी कलीसिया के पवित्रीकरण की बात करती है, तो क्या हमें यह समझना चाहिए कि वह केवल आंशिक रूप से पवित्र की जाएगी? जब परमेश्वर पवित्रता की माँग करता है, तो क्या हमें उसे आंशिक पवित्रता समझना चाहिए? निश्चय ही नहीं। तो फिर किस सिद्धान्त के आधार पर आप उसे आंशिक पवित्रता समझेंगे जब वह पवित्रता की प्रतिज्ञा करता है? हम इतने लम्बे समय से पवित्रशास्त्र को वर्तमान परिस्थितियों के सन्दर्भ में समझने के आदी रहे हैं कि हम उसके वास्तविक अर्थ को आँखों से ओझल कर देते हैं। परन्तु यदि हम केवल बाइबल की भाषा को देखें, तो मैं किसी भी मनुष्य को चुनौती देता हूँ कि वह यह सिद्ध करे कि पवित्रता की प्रतिज्ञाओं और भविष्यद्वाणियों का अर्थ पूर्ण पवित्रीकरण से कम कुछ है, जब तक कि व्यवस्था और सुसमाचार दोनों की माँगों को आंशिक आज्ञापालन के अर्थ में न समझा जाए, जो बेतुका है।

3. पूर्ण पवित्रीकरण वह बड़ी आशीष है जिसकी प्रतिज्ञा सारी बाइबल में की गई है।

प्रेरित कहता है कि हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएँ मिली हैं, और वे क्या हैं, और उनका उपयोग क्या है? “जिन के द्वारा उस ने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएँ दी हैं: ताकि इन के द्वारा तुम उस सड़ाहट से छूटकर जो संसार में बुरी अभिलाषाओं से होती है, ईश्वरीय स्वभाव के समभागी हो जाओ।” 2 पतरस 1:4।

यदि यह पूर्ण पवित्रीकरण नहीं है, तो मैं जानना चाहूँगा कि वह क्या है। यह एक स्पष्ट घोषणा है कि ये “बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएँ” इसी उद्देश्य से दी गई हैं, कि उन पर विश्वास करके, उन्हें अपना बनाकर और उनका उपयोग करके, हम ईश्वरीय स्वभाव के समभागी हो जाएँ। और यदि हम उनका उपयोग उन उद्देश्यों के लिए करें जिनके लिए वे बाइबल में रखी गई थीं, तो हम पूर्ण रूप से पवित्र हो सकते हैं।

आइए इनमें से कुछ प्रतिज्ञाओं को विशेष रूप से देखें। मैं अब्राहम की वाचा की प्रतिज्ञा से आरम्भ करूँगा। प्रतिज्ञा यह है कि उसका वंश कनान देश का अधिकारी होगा, और उसके द्वारा, अर्थात् मसीहा के द्वारा, सब जातियाँ आशीष पाएँगी। वाचा की मुहर, खतना, जिसके विषय में हर कोई जानता है कि वह पवित्रता का प्रतिरूप है, हमें दिखाती है कि मुख्य

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