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परन्तु यदि यही उसका सामान्य चरित्र है, तो यह एक पश्चाताप न करनेवाले पापी के चरित्र से किस प्रकार भिन्न है? यदि एक मसीही का अभ्यस्त चरित्र यही है, तो पवित्रशास्त्र के उन वर्णनों में सत्य का एक शब्द भी नहीं कि संत वे हैं जो वास्तव में परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं; क्योंकि यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है जिसे मसीही कहा जाता है, और जिसके विषय में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वह कभी आज्ञा नहीं मानता।
“सो मैं यह व्यवस्था पाता हूँ, कि जब भलाई करने की इच्छा करता हूँ, तो बुराई मेरे पास आती है।” यहाँ वह शारीरिक प्रवृत्तियों की क्रिया के विषय में बोलता है, कि वह इतनी निरन्तर और इतनी प्रबल है कि वह उसे एक “व्यवस्था” कहता है। “क्योंकि मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ।” यही बड़ी ठोकर का पत्थर है। क्या किसी पश्चाताप न करनेवाले पापी के विषय में यह कहा जा सकता है कि वह परमेश्वर की व्यवस्था से “प्रसन्न” रहता है? मैं उत्तर देता हूँ,
हाँ। मैं जानता हूँ कि यह अभिव्यक्ति प्रबल है, परन्तु प्रेरित आरम्भ से अन्त तक, दोनों पक्षों में, प्रबल भाषा का प्रयोग कर रहा था।
यह उस भाषा से अधिक प्रबल नहीं है जिसका प्रयोग यशायाह भविष्यद्वक्ता 58वें अध्याय में करता है। वह एक ऐसी पीढ़ी का वर्णन कर रहा था जो उतनी ही दुष्ट और बलवा करनेवाली थी जितनी कभी कोई पीढ़ी रही होगी। वह कहता है, “गला खोलकर पुकार, कुछ न रख छोड़, नरसिंगे का सा ऊँचे शब्द से पुकार; मेरी प्रजा को उसका अपराध अर्थात् याकूब के घराने को उसका पाप जता दे।” फिर भी वह इन्हीं लोगों के विषय में आगे कहता है, “तौभी वे प्रतिदिन मुझे ढूँढ़ते और मेरी गति जानने से प्रसन्न होते हैं, मानो वे ऐसी जाति हैं जिसने धर्म के काम किए और अपने
परमेश्वर के नियमों को नहीं टाला; वे मुझ से धर्म के नियम पूछते और परमेश्वर के निकट आने से प्रसन्न होते हैं।”
यहाँ पश्चाताप न करनेवाले पापियों का एक उदाहरण है जो स्पष्ट रूप से परमेश्वर के निकट आने से प्रसन्न होते हैं। ऐसा ही यहेजकेल 33:32 में है: “और देख, तू उनकी दृष्टि में प्रेम के मधुर गीत गानेवाले और अच्छे बजानेवाले का सा ठहरा है, क्योंकि वे तेरे वचन सुनते तो हैं, परन्तु उन पर चलते नहीं।” भविष्यद्वक्ता बता चुका था कि वे कितने दुष्ट थे। “वे प्रजा की नाईं तेरे पास आते और मेरी प्रजा बनकर तेरे साम्हने बैठकर तेरे वचन सुनते हैं, परन्तु वे उन पर चलते नहीं; मुँह से तो वे बहुत प्रेम दिखाते हैं, परन्तु उनका मन लालच ही में लगा रहता है।” यहाँ बिलकुल स्पष्ट रूप से पश्चाताप न करनेवाले पापी थे, तौभी वे उस वाक्पटु भविष्यद्वक्ता को सुनना पसन्द करते थे। भक्तिहीन पापी कितनी बार किसी योग्य पादरी के वाक्पटु प्रचार या प्रभावशाली तर्क से प्रसन्न होते हैं! उनके लिए वह एक बौद्धिक भोज होता है। और कभी-कभी वे उससे इतने प्रसन्न होते हैं कि सचमुच यह सोचने लगते हैं कि वे परमेश्वर के वचन से प्रेम करते हैं। यह हृदय की पूर्ण भ्रष्टता के साथ, और परमेश्वर के सच्चे चरित्र के प्रति शत्रुता के साथ, पूरी तरह मेल खाता है। वरन् यह उनकी भ्रष्टता को और भी अधिक स्पष्ट प्रकाश में रखता है, क्योंकि वे सही को जानते और उसका अनुमोदन करते हैं, और फिर भी गलत करते हैं।
इसलिए, व्यवस्था से इस प्रसन्नता के होते हुए भी, वह कहता है, “परन्तु मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती है, जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है, और मुझे पाप की व्यवस्था के बन्धन में डालती है जो मेरे अंगों में है। मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” यहाँ ये शब्द, “मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ,” स्पष्ट रूप से एक कोष्ठक-वाक्य हैं, और विचार के क्रम में एक व्यवधान हैं। फिर वह सारी बात का निचोड़ देता है, “निदान मैं आप बुद्धि से तो परमेश्वर की व्यवस्था का, परन्तु शरीर से पाप की व्यवस्था का सेवन करता हूँ।”
यह मानो ऐसा है जैसे उसने कहा हो, मेरा उत्तम स्वरूप, मेरी निष्पक्ष बुद्धि, मेरा विवेक, परमेश्वर की व्यवस्था का अनुमोदन करता है; परन्तु मेरे अंगों की व्यवस्था, मेरी वासनाएँ, मुझ पर ऐसा नियंत्रण रखती हैं कि मैं फिर भी आज्ञा का उल्लंघन करता हूँ। स्मरण रखिए, प्रेरित एक ऐसे व्यक्ति के अभ्यस्त चरित्र का वर्णन कर रहा था जो पूरी तरह पाप के प्रभुत्व में था। उसके उद्देश्य के लिए यह असंगत होता कि वह एक
