व्याख्यान 252 (253 में से)

धर्म के नाम पर चलनेवाली कितनी उत्तेजना में प्रेम नहीं होता। कितने जोश में कोई ध-

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धर्म के नाम पर चलनेवाली कितनी उत्तेजना में प्रेम नहीं होता। कितने जोश में कोई धर्म नहीं होता। उस मनुष्य को देखिए जो सदा कड़वे जोश से भरा रहता है, और यदि उसे इसके लिये डाँटा जाए, तो पौलुस के उदाहरण की शरण लेता है, जब उसने कहा था, “हे शैतान की सन्तान।” यदि वह सिद्ध प्रेम के प्रभाव में होता, तो वह देखता कि उसकी परिस्थितियाँ इतनी भिन्न हैं कि वे ऐसी आत्मा के प्रयोग को उचित नहीं ठहरातीं।

VI. जो धार्मिक उत्तेजनाएँ प्रेम की आत्मा में निहित नहीं हैं, वे धर्म की जागृतियाँ नहीं हैं।

सम्भव है कि कलीसिया बहुत उत्तेजित हो, और जोश के बड़े प्रदर्शन और कोलाहल भरे शोर के साथ इधर-उधर दौड़-धूप करे, परन्तु आत्मा की कोई कोमलता न हो। सम्भव है कि जो लोग इधर-उधर जाते हैं वे ढिठाई और असभ्यता की आत्मा दिखाएँ, और जिस परिवार में भी जाएँ उससे झगड़ा मोल लें। मैं एक बार एक युवक को जानता था जिसने स्वीकार किया कि उसका लक्ष्य लोगों को क्रोधित करना था, और इसका जो कारण उसने बताया वह यह था, कि इससे प्रायः वे पाप के बोध में आ जाते थे, और इस प्रकार उसका परिणाम मन-परिवर्तन होता था। और ऐसा तब भी हो सकता था यदि वह भीतर जाकर उनके सामने भयानक ईशनिन्दा की बातें बोलता, जब तक कि वे डरकर अपने चरित्र पर विचार करने न लगते। परन्तु कौन ऐसे आचरण का इस आधार पर बचाव करेगा कि कभी-कभी उसका ऐसा परिणाम निकलता था? और यदि उत्तेजना का यही चरित्र हो, तो वह क्रोध, और बैरभाव, और सब प्रकार की निर्दयता की जागृति हो सकती है, परन्तु वह धर्म की जागृति नहीं है। मेरा यह अर्थ नहीं कि जब कुछ या बहुत लोग क्रोध से भरे हों, तो यह निश्चित प्रमाण है कि धर्म की कोई जागृति नहीं है; वरन् यह कि जब उत्तेजना का प्रधान चरित्र यही हो, तो वह धर्म की सच्ची जागृति नहीं है। उनमें से कुछ में प्रेम की आत्मा हो सकती है, परन्तु निश्चय ही जो लोग कड़वे और विवादी जोश से भरे हैं, वे सचमुच धार्मिक नहीं हैं। कुछ व्यक्तियों में धर्म जागृत हो सकता है, परन्तु ऐसी स्थितियों में, मुख्य रूप से, वह अधार्मिकता की जागृति होती है।

VII. जब लोग मन-परिवर्तन का अंगीकार करते हैं, तो यदि प्रेम उनके चरित्र की प्रधान विशेषता नहीं, तो उनका सचमुच मन-परिवर्तन नहीं हुआ है।

अन्य बातों में वे चाहे कितने ही अच्छे दिखाई दें, उनके विचार चाहे कितने ही स्पष्ट हों, या उनकी भावनाएँ कितनी ही गहरी हों, यदि उनमें परमेश्वर के प्रति प्रेम, और मनुष्य के प्रति प्रेम की आत्मा नहीं, तो वे धोखे में हैं। ऐसे किसी नए विश्वासी पर भरोसा न किया जाए।

VIII. देखिए, जब मनुष्यजाति सर्वत्र प्रेम की आत्मा से प्रेरित होगी, तब संसार कैसा होगा।

हम सीखते हैं कि वह समय आएगा, जब न कोई दुःख देगा और न हानि करेगा, और जब प्रेम की आत्मा सर्वत्र प्रबल होगी। समाज में कैसा परिवर्तन होगा! व्यापार करने की सब रीतियों में, और मनुष्यजाति के सारे परस्पर व्यवहार में कैसा परिवर्तन होगा, जब हर एक अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखेगा, और दूसरों की भलाई को अपनी भलाई के समान चाहेगा। यदि वर्तमान समय के पवित्र लोगों में से कोई उस समय पृथ्वी पर फिर आ सके, तो वह उस संसार को पहचान न पाएगा जिसमें वह रहा था, सब बातें इतनी बदल गई होंगी। वह पुकार उठेगा, क्या यह सम्भव है, “कि यह पृथ्वी है; वही पृथ्वी जो कलह, और अत्याचार, और छल से इतनी भरी रहती थी?”

IX. वह बात जिस पर प्रभु यीशु मसीह दृढ़ता से लगा हुआ है, यह है कि सारी मनुष्यजाति को प्रेम के प्रभाव के अधीन ले आए।

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