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किसी पापी की जीवित वास्तविकता के सम्पर्क में लाइए, उससे तर्क कीजिए, उसे समझाइए, उसकी कुतर्क भरी आपत्तियों का, उसके हठ का, उसकी कपटता का पता लगाइए, यदि हो सके तो उसके साथ प्रार्थना कीजिए। आप यह सब अपने मन में भावनाएँ जगाए बिना नहीं कर सकते, और यदि आप मसीही हैं, तो इससे शोक, करुणा और क्रोध की वैसी ही मिश्रित भावनाएँ जागेंगी जैसी यीशु मसीह अनुभव करता है, और जो आपके लिए इस विषय में अपने हृदय की दशा पर सन्देह करने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ेंगी। अपने मन को पापियों के सम्पर्क में लाइए, और उसे वहीं टिकाइए, और विश्वास रखिए कि आप अवश्य अनुभव करेंगे।
4. आप परमेश्वर के प्रति अपने मन की दशा को जाँचना चाहते हैं।
अपने विचारों को एकाग्रता से परमेश्वर पर टिकाइए। और अपने मूर्ख हृदयों के अनुसार किसी परमेश्वर की कल्पना करने मत बैठिए, बल्कि बाइबल लीजिए और वहाँ सीखिए कि परमेश्वर का सच्चा स्वरूप क्या है।
किसी आकार या रूप की कल्पना मत कीजिए, या यह मत सोचिए कि वह कैसा दिखता है, बल्कि अपने मन को बाइबल के उस वर्णन पर टिकाइए कि वह कैसा अनुभव करता है, और क्या करता है, और क्या कहता है, और आप अनुभव किए बिना नहीं रह सकते। यहीं आप अपने हृदय की वास्तविक दशा को पहचान लेंगे। वरन्, यही आपके हृदय की वास्तविक दशा होगी, जिसे पहचानने में आप भूल नहीं कर सकते।
5. मसीह के प्रति अपनी भावनाओं को परखिए।
यह जानना आपका कर्तव्य है कि आप प्रभु यीशु मसीह से प्रेम करते हैं या नहीं। उसके जीवन की घटनाओं पर दृष्टि दौड़ाइए, और देखिए कि क्या वे आपके मन को वास्तविकताएँ प्रतीत होती हैं, उसके आश्चर्यकर्म, उसके दुःख, उसका मनोहर चरित्र, उसकी मृत्यु, उसका पुनरुत्थान, उसका स्वर्गारोहण, और परमेश्वर के सिंहासन की दाहिनी ओर अब उसकी मध्यस्थता। क्या आप इन सब पर विश्वास करते हैं? क्या वे आपके मन के लिए वास्तविकताएँ हैं? उन्हें देखकर आपकी भावनाएँ क्या हैं? जब आप उद्धार करने की उसकी इच्छा, उद्धार करने की उसकी सामर्थ, उसकी प्रायश्चित करनेवाली मृत्यु, उसकी शक्ति के विषय में सोचते हैं, तो यदि ये बातें आपके लिए वास्तविकताएँ हैं, तो आपकी ऐसी भावनाएँ होंगी जिनकी आपको चेतना होगी, और जिनके विषय में कोई भूल नहीं होगी।
6. पवित्र लोगों के प्रति आपकी भावनाएँ क्या हैं।
यदि आप इस बात में अपने हृदय को परखना चाहते हैं कि आप पवित्र लोगों से प्रेम करते हैं या नहीं, तो अपने विचारों को पृथ्वी की छोर तक भटकने मत दीजिए, बल्कि अपने मन को अपने पास के पवित्र लोगों पर टिकाइए और देखिए कि क्या आप उनसे प्रेम करते हैं, क्या आप उनके पवित्रीकरण की अभिलाषा करते हैं, क्या आप सचमुच लालायित हैं कि वे अनुग्रह में बढ़ें, क्या आप उन्हें विश्वास के साथ अपने हृदय में अनुग्रह के सिंहासन के सामने ले जा सकते हैं, और परमेश्वर से माँग सकते हैं कि वह उन्हें आशीषें दे।
7. इसी प्रकार जागृतियों के सम्बन्ध में।
आप जानना चाहते हैं कि जागृतियों के प्रति आपकी भावनाओं की दशा क्या है, तो उनके विषय में पढ़िए, उनके विषय में सोचिए, अपने मन को उन पर टिकाइए, और आप ऐसी भावनाएँ अनुभव किए बिना नहीं रह सकते जो आपके हृदय की दशा को प्रगट कर देंगी। यही बात अन्यजातियों के, दासों के, मतवालों के, बाइबल के, और भक्तिपूर्ण आदर के किसी भी विषय के सम्बन्ध में सत्य है। अपने हृदय की दशा को जानने का एकमात्र मार्ग यह है कि अपने मन को उन बातों की वास्तविकता पर तब तक टिकाए रखें, जब तक आप इतनी तीव्रता से अनुभव न करने लगें कि अपनी भावनाओं के स्वभाव को पहचानने में कोई भूल न रहे।
यदि आपको इनमें से किसी भी विषय पर इतना ध्यान देने में कठिनाई हो कि भावना उत्पन्न हो सके, तो यह दो में से किसी एक कारण से है, या तो आपका मन धर्म के किन्हीं दूसरे भागों में ऐसा लगा हुआ है कि वह उस निर्दिष्ट विषय पर ऐसा स्थिर ध्यान नहीं लगने देता, या फिर आपके विचार
