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आपत्ति 2. “क्या मसीह ने उस आनन्द का ध्यान नहीं रखा जो उसके आगे धरा था? और क्या मूसा की भी आँखें फल पाने की ओर नहीं लगी थीं? और क्या बाइबल यह नहीं कहती कि हम परमेश्वर से इसलिए प्रेम करते हैं कि पहले उसने हम से प्रेम किया।”
उत्तर 1. यह सच है कि मसीह ने लज्जा की कुछ चिन्ता न करके क्रूस का दुख सहा, और उस आनन्द का ध्यान रखा जो उसके आगे धरा था। परन्तु वह आनन्द क्या था जो उसके आगे धरा था? उसका अपना उद्धार नहीं, उसकी अपनी प्रसन्नता नहीं, बल्कि वह बड़ी भलाई जो वह संसार के उद्धार में करनेवाला था। वह अपने आप में पूर्ण रूप से सुखी था। परन्तु उसका लक्ष्य दूसरों की प्रसन्नता थी। यही वह आनन्द था जो उसके आगे धरा था। और वह उसने पा लिया।
उत्तर 2. इसी प्रकार मूसा की आँखें फल पाने की ओर लगी थीं। परन्तु क्या वह फल उसका अपना सुख था? कदापि नहीं। वह फल इस्राएल के लोगों का उद्धार था।
उसने क्या कहा? जब परमेश्वर ने उस जाति को नष्ट करने और उससे एक बड़ी जाति बनाने का प्रस्ताव रखा, तब यदि मूसा स्वार्थी होता तो कहता, “यह ठीक है, हे प्रभु; तेरे वचन के अनुसार तेरे दास के साथ हो।” परन्तु वह क्या कहता है? अजी, उसका मन अपने लोगों के उद्धार पर, और परमेश्वर की महिमा पर इतना लगा था कि उसने एक क्षण के लिए भी उस बात पर विचार न किया, बल्कि कहा, “यदि तू चाहे, तो उनका पाप क्षमा कर; और नहीं तो अपनी लिखी हुई पुस्तक में से, मैं तुझ से बिनती करता हूँ, मुझे मिटा दे।” और एक दूसरे अवसर पर, जब परमेश्वर ने कहा कि वह उन्हें नष्ट कर देगा, और मूसा से एक उससे भी बड़ी और सामर्थी जाति बनाएगा, तब मूसा ने परमेश्वर की महिमा का विचार किया, और कहा, “तब मिस्री यह सुनेंगे, और सब जातियाँ कहेंगी, कि यह इसलिए हुआ कि यहोवा इन लोगों को उस देश में पहुँचा न सका।”
वह परमेश्वर की महिमा की कीमत पर अपना हित ऊँचा किए जाने का विचार तक सह न सका। उसके परोपकारी मन के लिए परमेश्वर की महिमा होना, और इस्राएलियों का उद्धार होना, सचमुच किसी भी ऐसे व्यक्तिगत लाभ से बड़ा प्रतिफल था जो उसे स्वयं मिल सकता था।
उत्तर 3. जहाँ यह कहा गया है, “हम उससे इसलिए प्रेम करते हैं कि पहले उसने हम से प्रेम किया,” वहाँ इस भाषा के स्पष्ट रूप से दो अर्थ हो सकते हैं; या तो यह कि हमारे प्रति उसके प्रेम ने हमारे लौटने का मार्ग, और वह प्रभाव जिसने हमें उससे प्रेम करने तक पहुँचाया, उपलब्ध कराया है; या यह कि हम उससे उस कृपा के कारण प्रेम करते हैं जो उसने हम पर की है।
यह स्पष्ट है कि दूसरा अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि यीशु मसीह ने अपने पहाड़ी उपदेश में इस सिद्धान्त की इतनी स्पष्टता से निन्दा की है: “यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारी क्या बड़ाई? क्या महसूल लेनेवाले भी ऐसा ही नहीं करते?” यदि हम परमेश्वर से उसके चरित्र के कारण नहीं, बल्कि हम पर की गई उसकी कृपाओं के कारण प्रेम करते हैं, तो यीशु मसीह ने हमें निकम्मा ठहरा दिया है।
आपत्ति 3. “क्या बाइबल सद्गुण के प्रतिफल के रूप में प्रसन्नता देने की बात नहीं कहती?”
उत्तर। बाइबल प्रसन्नता को सद्गुण का परिणाम बताती है, परन्तु कहीं भी यह घोषणा नहीं करती कि सद्गुण अपनी प्रसन्नता का पीछा करने में है। बाइबल सब कहीं इसके विपरीत है, और बताती है कि सद्गुण दूसरों की भलाई करने में है। मन के विज्ञान से हम देख सकते हैं कि ऐसा ही होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति दूसरों की भलाई चाहता है, तो वह उसी अनुपात में सुखी होगा जिस अनुपात में वह उस इच्छा को तृप्त करता है। प्रसन्नता सद्गुण का परिणाम है, परन्तु सद्गुण सीधे अपनी प्रसन्नता का पीछा करने में नहीं है, बल्कि उससे पूरी तरह असंगत है।
