व्याख्यान 183 (253 में से)

II. मुझे इस खण्ड को ठीक-ठीक समझने का महत्व दिखाना है।

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II. मुझे इस खण्ड को ठीक-ठीक समझने का महत्व दिखाना है।

इस खण्ड को ठीक-ठीक समझना अवश्य ही मूलभूत बात है। यदि यह खण्ड वास्तव में पाप का बोध पाए हुए किसी पापी का, या पूरी तरह व्यवस्था के अधीन के अनुभव का वर्णन करता है, और यदि कोई व्यक्ति यह समझकर कि यह मसीही अनुभव है, अपने अनुभव को इसके अनुरूप पाता है, तो उसकी भूल घातक है। यदि पौलुस वास्तव में केवल व्यवस्था के उद्देश्यों और विचारों के अधीन रहनेवाले एक पापी का अनुभव बता रहा है, तो अपने अनुभव को एक सच्चे मसीही का अनुभव मानकर उस पर इसलिए निश्चिन्त हो जाना कि वह रोमियों के सातवें अध्याय के अनुरूप है, अवश्य ही एक घातक भूल होगी।

III. मैं कुछ ऐसे सिद्धान्त और तथ्य रखूँगा जिनका इस विषय को स्पष्ट करने से सम्बन्ध है।

1. यह सत्य है कि मनुष्य सब दशाओं में उसी के अनुसार काम करते हैं, और मन के स्वभाव के कारण सदा उसी के अनुसार काम करने को बाध्य हैं, जिसे वे कुल मिलाकर अधिक उत्तम समझते हैं।

या दूसरे शब्दों में, इच्छा आचरण पर शासन करती है। मनुष्य कभी अपनी इच्छा के विरुद्ध काम नहीं करते। इच्छा ही अंगों की गति पर शासन करती है। स्वेच्छा से काम करनेवाले प्राणी अपनी इच्छा के विपरीत काम नहीं कर सकते।

2. मनुष्य प्रायः उस बात की अभिलाषा करते हैं जिसे वे कुल मिलाकर चुनते नहीं।

अभिलाषाएँ और इच्छा प्रायः एक दूसरे के विरोध में होती हैं। आचरण पर चुनाव का शासन होता है, अभिलाषाओं का नहीं। अभिलाषाएँ चुनाव से मेल न खानेवाली हो सकती हैं। हो सकता है कि आज रात आप किसी और स्थान पर जाने की अभिलाषा करें, और फिर भी कुल मिलाकर यहीं रहना चुनें। शायद आप बहुत प्रबल रूप से कहीं और होने की अभिलाषा करते हैं, और फिर भी सभा में बने रहना चुनते हैं। कोई मनुष्य किसी स्थान की यात्रा पर जाना चाहता है। शायद वह इसकी प्रबल अभिलाषा करता है। यह उसके व्यापार या उसकी महत्वाकांक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। परन्तु उसके परिवार के लोग बीमार हैं, या कोई और बात उससे घर पर रहने की माँग करती है, और कुल मिलाकर वह रुकना चुनता है। सब दशाओं में आचरण वास्तविक चुनाव के पीछे चलता है।

3. नया जन्म, या मन-परिवर्तन, चुनाव में परिवर्तन है।

यह मन के सर्वोच्च, नियन्त्रण करनेवाले चुनाव में परिवर्तन है। नया जन्म पाया हुआ या मन फिराया हुआ व्यक्ति परमेश्वर की महिमा को और सब बातों से बढ़कर पसन्द करता है। वह उसे अपने स्नेह के सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में चुनता है। यही हृदय का परिवर्तन है। पहले वह अपने स्वार्थ या सुख को अपने सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में चुनता था। अब वह अपने स्वार्थ के स्थान पर परमेश्वर की सेवा को चुनता है। जब कोई व्यक्ति सचमुच नये सिरे से जन्म लेता है, तो उसका चुनाव आदतन सही होता है, और निश्चय ही उसका आचरण मुख्यतः सही होता है।

परीक्षा का बल कभी-कभार कोई गलत चुनाव, या यहाँ तक कि गलत चुनावों का एक सिलसिला भी उत्पन्न कर सकता है, परन्तु उसके आचरण का आदतन मार्ग सही होता है। मन फिराए हुए व्यक्ति की इच्छा, या चुनाव, आदतन सही होता है, और निश्चय ही उसका आचरण भी सही होता है। यदि यह सत्य नहीं, तो मैं पूछता हूँ, मन फिराया हुआ व्यक्ति मन न फिराए हुए व्यक्ति से किस बात में भिन्न है? यदि मन फिराए हुए व्यक्ति का चरित्र यह नहीं है कि वह आदतन परमेश्वर की आज्ञाओं पर चलता है, तो उसका चरित्र क्या है?

परन्तु मैं मानता हूँ कि जो कोई नये जन्म की शिक्षा पर विश्वास करता है, वह इस बात पर विवाद नहीं करेगा।

4. नैतिक कर्ताओं की रचना ऐसी की गई है कि वे स्वाभाविक रूप से और अनिवार्य रूप से उस बात का समर्थन करते हैं जो सही है।

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