व्याख्यान 210 (253 में से)

व्यवस्था को समझता हूँ, उनकी व्यवस्था यही होनी चाहिए। वे इसे ऐसा समझें

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व्यवस्था को समझता हूँ, उनकी व्यवस्था यही होनी चाहिए। वे इसे ऐसा समझें या न समझें, इसे ऐसा स्वीकार करें या न करें, जहाँ तक मैं देख सकता हूँ, बात यहीं आकर ठहरती है।

वे मसीह के प्रायश्चित को एक ओर रख देते हैं, और यीशु मसीह की धार्मिकता के द्वारा उद्धार पाने की आशा नहीं रखते; और मैं नहीं जानता कि इसके सिवा वे और किस बात पर भरोसा रखते हैं। ऐसा लगता है कि उनका एक प्रकार का भावुक धर्म है, और इसी पर, अपनी नैतिकता और अपनी उदारता के साथ, वे भरोसा रखते हैं कि यह उन्हें परमेश्वर की दया का पात्र ठहराएगा। इसी आधार पर वे अपने पापों की क्षमा पाने और उद्धार पाने की आशा रखते हैं।

3. कामों के धर्म का एक और रूप वह है जिसमें लोग मसीह को ग्रहण करने के लिए अपने आप को तैयार करने का प्रयत्न कर रहे होते हैं।

वे समझते हैं कि उद्धार केवल यीशु मसीह के द्वारा ही है। वे जानते हैं कि वे न तो कामों के द्वारा, और न प्रायश्चित के बिना परमेश्वर की सामान्य दया के द्वारा उद्धार पा सकते हैं, और कि उद्धार पाने का एकमात्र मार्ग मसीह पर विश्वास है। परन्तु उन्होंने दूसरों के अनुभवों के वर्णन सुने हैं, जो मसीह के अधीन होने और विश्वास करने में शान्ति पाने से पहले व्याकुलता की एक लम्बी प्रक्रिया से गुज़रे थे। और वे सोचते हैं कि एक निश्चित तैयारी की प्रक्रिया आवश्यक है, और कि उन्हें बहुत-सी प्रार्थनाएँ करनी होंगी, और सभाओं में जाने के लिए इधर-उधर दौड़ना होगा, और बहुत-सी रातें जागते हुए बितानी होंगी, और इतनी व्याकुलता सहनी होगी, और शायद निराशा में भी पड़ना होगा, और तब वे मसीह को ग्रहण करने की स्थिति में होंगे।

बहुत-से ऐसे पापियों की यही दशा है जिन्हें पाप का बोध हो चुका है। जब वे जाग उठते हैं, और इतना समझ लेते हैं कि वे अपने कामों के द्वारा उद्धार नहीं पा सकते, तब वे मसीह को ग्रहण करने की तैयारी में लग जाते हैं। शायद आप में से कुछ लोग, जो आज रात यहाँ हैं, ठीक इसी दशा में हैं।

आप अभी जैसे हैं वैसे ही मसीह के पास आने का साहस नहीं करते, क्योंकि आपने अभी इतनी कम प्रार्थनाएँ की हैं, और इतनी कम सभाओं में गए हैं, और इतनी कम व्याकुलता अनुभव की है, और इतना कम किया है, और इतना कम लगन से लगे रहे हैं।

और इसलिए, एक दीन और खोए हुए पापी के समान अपनी सारी आवश्यकताओं के लिए सीधे मसीह के पास जाने, और बिना किसी संकोच के अपने आप को उसके हाथों में सौंप देने के बजाय, आप मसीह को ग्रहण करने के लिए अपने आप को तैयार करने के उद्देश्य से अपने मन को कोड़े मार-मारकर और अधिक पाप-बोध और व्याकुलता में डालने में लग जाते हैं। ऐसे उदाहरण लगभग उतने ही आम हैं जितने पाप का बोध पाए हुए पापी। कितने ही ऐसे हैं जो ऐसे कामों में बढ़-चढ़कर लगे रहते हैं, और ऐसा लगता है कि उन्होंने ठान लिया है कि वे तुरन्त मसीह के चरणों पर नहीं गिरेंगे। यहाँ यह दिखाने के लिए कोई तर्क करने की आवश्यकता नहीं कि इस सारी प्रक्रिया से वे रत्ती भर भी अच्छे नहीं होते जा रहे हैं। इसमें न परमेश्वर से प्रेम है, न विश्वास, न धर्म। यह सब परमेश्वर का निरा उपहास, और कपट, और पाप है। इसमें भावना तो बहुत हो सकती है, परन्तु उसका कोई लाभ नहीं; वास्तव में वह उन्हें मसीह के तनिक भी निकट नहीं लाती; और आखिरकार उन्हें अन्त में ठीक वही करना पड़ता है जो वे आरम्भ में भी उतनी ही अच्छी तरह कर सकते थे।

अब मान लीजिए कि कोई व्यक्ति अपने मन में यह बैठा ले कि पवित्र बनने का यही मार्ग है। हर मसीही देख सकता है कि यह बहुत ही बेतुका है, और वह ऐसे कामों को चाहे कितना भी बढ़ा ले, वह पवित्रता के निकट पहुँचना आरम्भ भी नहीं कर रहा है। पवित्रता का पहला कार्य विश्वास करना है, विश्वास के द्वारा मसीह को थाम लेना है। और यदि कोई मसीही, जो पवित्रीकरण की आवश्यकता अनुभव करने के लिए जाग उठा है, मसीह के पास जाने से पहले स्वयं उत्पन्न की हुई व्याकुलता की तैयारी-प्रक्रिया से गुज़रने का बीड़ा उठाता है, तो यह ठीक उतना ही बेतुका है जितना किसी जागे हुए पापी का ऐसा करना।

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