व्याख्यान 136 (253 में से)

1. इस विषय से हम देखते हैं कि धर्म का अंगीकार करनेवालों के विचार इतने भिन्न क्यों होते हैं

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1. इस विषय से हम देखते हैं कि धर्म का अंगीकार करनेवालों के विचार सुसमाचार के स्वरूप के विषय में इतने भिन्न क्यों होते हैं।

कुछ लोग उसे मनुष्यजाति के लिए केवल एक रियायत की बात समझते हैं, जिसके द्वारा परमेश्वर उतना कठोर नहीं रहा जितना वह व्यवस्था के अधीन था; ताकि वे फ़ैशनपरस्त या सांसारिक रह सकें, और सुसमाचार आकर उनकी कमियों को पूरा कर देगा और उन्हें बचा लेगा। दूसरा वर्ग सुसमाचार को ईश्वरीय परोपकार का एक प्रबन्ध समझता है, जिसका मुख्य उद्देश्य पाप को नष्ट करना और पवित्रता को बढ़ाना है; और इसलिए उनके लिए यह उचित ठहराना तो दूर कि वे उससे कम पवित्र हों जितना उन्हें व्यवस्था के अधीन होना चाहिए था, उसका सारा मूल्य इसी में है कि उसमें उन्हें पवित्र बनाने की सामर्थ है।

2. हम देखते हैं कि कुछ लोग कलीसिया को पवित्र होते हुए, और परमेश्वर के लोगों के भले कामों के द्वारा उसकी महिमा होते हुए देखने से कहीं अधिक पापियों का मन-परिवर्तन कराने के लिए इतने उत्सुक क्यों रहते हैं।

बहुत से लोग पापियों के प्रति एक स्वाभाविक सहानुभूति रखते हैं, और चाहते हैं कि वे नरक से बचाए जाएँ; और यदि यह हो जाए, तो उन्हें और कोई चिन्ता नहीं रहती। परन्तु सच्चे संत पाप से सबसे अधिक इसलिए प्रभावित होते हैं कि वह परमेश्वर का अनादर करता है। और मसीहियों को पाप करते देखकर वे सबसे अधिक व्याकुल होते हैं, क्योंकि उससे

परमेश्वर का और भी अधिक अनादर होता है। कुछ लोगों को इसकी बहुत कम चिन्ता जान पड़ती है कि कलीसिया कैसा जीवन बिताती है, बशर्ते वे मन-परिवर्तन के काम को आगे बढ़ता देख सकें। उन्हें इस बात की उत्सुकता नहीं कि परमेश्वर का आदर हो। इससे प्रकट होता है कि वे पवित्रता के प्रेम से नहीं, बल्कि पापियों के प्रति केवल करुणा से प्रेरित होते हैं।

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