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अध्याय 1: अपने आप को धोखा देनेवाले। हारिक व्याख्यान,” तो मैं आशा करता हूँ कि आपने मेरा यह अर्थ नहीं समझा कि ये व्याख्यान सैद्धान्तिक नहीं होंगे, या इनमें कोई सिद्धान्त नहीं होगा। मेरा उद्देश्य यह है कि, यदि प्रभु चाहे, तो मैं व्यावहारिक सिद्धान्तों पर व्याख्यानों की एक श्रृंखला प्रचार करूँ। जिस सिद्धान्त पर मैं अभी विचार करना चाहता हूँ, वह यह है: धर्म का अंगीकार करनेवाला जो व्यक्ति उस बात पर नहीं चलता जिसे वह स्वयं सत्य मानता है, वह अपने आप को धोखा दे रहा है।
धर्म का अंगीकार करनेवालों में दो प्रकार के कपटी होते हैं: वे जो दूसरों को धोखा देते हैं, और वे जो अपने आप को धोखा देते हैं। एक प्रकार के कपटी वे हैं जो नैतिकता और धर्म के एक लुभावने बाहरी आवरण के नीचे परमेश्वर के प्रति अपने हृदय की शत्रुता को ढाँप लेते हैं, और दूसरों को यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि वे बड़े भक्त लोग हैं। इसी प्रकार फरीसियों ने धर्म के अपने बाहरी दिखावे, अपने दान और अपनी लम्बी प्रार्थनाओं के द्वारा असाधारण भक्त होने की ख्याति प्राप्त कर ली थी। दूसरा वर्ग वह है जिसका उल्लेख मूल पद में किया गया है, जो दूसरों को नहीं, बल्कि अपने आप को धोखा देते हैं।
ये लोग विचारों में तो सही सिद्धान्तवाले हैं, परन्तु आचरण में ढीले हैं। वे ऐसा समझते प्रतीत होते हैं कि धर्म आचरण की कोई चिन्ता किए बिना कुछ धारणाओं के एक पुलिन्दे में ही निहित है, और इस प्रकार सच्ची पवित्रता से रहित होते हुए भी यह सोचकर अपने आप को धोखा देते हैं कि वे अच्छे मसीही हैं। वे वचन के सुननेवाले हैं, परन्तु उस पर चलनेवाले नहीं। उन्हें सही सिद्धान्तवाला प्रचार प्रिय है, और धर्म के अमूर्त सिद्धान्तों को प्रस्तुत होते सुनने में उन्हें बड़ा आनन्द मिलता है, और सम्भवतः परमेश्वर के चरित्र और शासन को ध्यान में रखकर उनकी कल्पना ऊँची उड़ानें भरती है और उनमें उमंग भरी भावनाएँ उठती हैं; परन्तु वे परमेश्वर के वचन की आज्ञाओं पर चलने की चिन्ता नहीं करते, और न उन्हें उन सिद्धान्तों का प्रचार अच्छा लगता है जो मनुष्य के आचरण से सम्बन्ध रखते हैं।
सम्भवतः आज रात यहाँ इन दोनों प्रकार के कपटियों में से कुछ लोग उपस्थित हैं। अब ध्यान दीजिए!
आज रात मैं आप में से उन लोगों को प्रचार नहीं करने जा रहा जो नैतिकता की बड़ी कठोरता और धर्म के बाहरी दिखावे के द्वारा दूसरों को धोखा देते हैं। अभी मैं आप में से उन लोगों से बात कर रहा हूँ जो उस बात पर नहीं चलते जिसे वे सत्य जानते हैं, जो सुननेवाले हैं पर चलनेवाले नहीं। ध्यान खींचने के लिए शायद मुझे यह कहना अच्छा होगा कि बहुत सम्भव है कि इस समय यहाँ इस प्रकार के अनेक लोग हैं। मैं आपके नाम नहीं जानता; परन्तु मैं चाहता हूँ कि आप यह समझ लें कि यदि आप इस प्रकार के व्यक्ति हैं, तो आप ही वे लोग हैं जिनसे मैं बात कर रहा हूँ, ठीक वैसे ही मानो मैं आपका नाम लेकर पुकार रहा हूँ। मेरा अभिप्राय आप ही से है। आप वचन को सुनते हैं, और सिद्धान्त रूप में उस पर विश्वास करते हैं, जबकि व्यवहार में उसका इन्कार करते हैं। मैं आप से कहता हूँ कि “आप अपने आप को धोखा देते हैं।” मूल पद इसे प्रमाणित करता है। यहाँ इसके लिए आपके पास एक स्पष्ट “यहोवा यों कहता है” है कि ऐसे सब लोग अपने आप को धोखा देनेवाले हैं। मैं पवित्रशास्त्र के कई अन्य पद उद्धृत कर सकता हूँ जो इस विषय पर ठीक बैठते हैं, और बात को वहीं छोड़ सकता हूँ। परन्तु मैं पवित्रशास्त्र की सीधी गवाही के अतिरिक्त कुछ अन्य बातों की ओर भी आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ। पहली बात, आप वास्तव में वचन पर विश्वास नहीं करते। आप उसे सुनते हैं, और उसे सत्य मानते हैं, परन्तु आप सचमुच उस पर विश्वास नहीं करते। और यहाँ मैं यह कह दूँ कि इस विषय में लोग स्वयं धोखा खा सकते हैं। ऐसा नहीं कि उनकी चेतना उन्हें धोखा देता है, परन्तु वे यह नहीं समझते कि उनकी चेतना किस बात की गवाही दे रही है।
सुसमाचारीय, अर्थात् उद्धार देनेवाले विश्वास के लिए दो बातें अनिवार्य हैं। पहली है किसी बात की सच्चाई का बौद्धिक निश्चय। और यहाँ मेरा अर्थ केवल उसकी अमूर्त सच्चाई से नहीं, बल्कि आप पर उसके प्रभाव से है। सत्य को, आपके साथ उसके सम्बन्ध में, या आपके आचरण पर उसके प्रभाव के रूप में, बुद्धि से ग्रहण किया जाना चाहिए। और फिर सच्चे विश्वास में उसके अनुरूप
