व्याख्यान 121 (253 में से)

उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया, और अन्त में उसे मार डाला, उतनी ही कठोर-हृदय क्रूरता से जितनी से कभी

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उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया, और अन्त में उसे मार डाला, उतनी ही कठोर-हृदय क्रूरता से जितनी से कभी उनके बापदादों ने किसी भविष्यद्वक्ता को मारा था। “तुम अपने बापदादों के पाप का घड़ा भर दो,” हमारा उद्धारकर्ता कहता है, “जिससे धर्मियों का जितना लहू पृथ्वी पर बहाया गया है, वह सब तुम्हारे सिर पर पड़े।”

मनुष्यजाति संसार के हर युग में सदा अपनी ही कल्पना की गढ़ी हुई कहानियों पर मोहित होती आई है, जिनसे ठोकर खाकर वह नरक में जा गिरी है। यूनिवर्सलिस्ट को देखिए। वह एक ऐसे परमेश्वर की कल्पना करता है जो हर हाल में सब का उद्धार करेगा, और एक ऐसे स्वर्ग की जिसमें सब के लिए स्थान होगा; और फिर वह उस परमेश्वर से प्रेम करता है जिसे उसने बनाया है, और उस स्वर्ग से जिसकी उसने कल्पना की है, और शायद प्रेम के मारे रो भी पड़ेगा। उसकी भावनाएँ प्रायः गहरी होती हैं, परन्तु वे धोखा देनेवाली हैं, क्योंकि वे सत्य से नहीं, बल्कि गढ़ी हुई कहानी से उत्तेजित होती हैं।

3. कोई व्यक्ति जितना अधिक अपने आप से बाहर निकलता है, और उन बातों को, जो उससे सम्बन्धित नहीं, अपने विचार का विषय बनाता है, उतनी ही अधिक भक्ति उसमें होगी, और उतना ही अधिक उसकी भक्ति का प्रमाण होगा।

धर्म प्रेम में है, ठीक अनुभव करने और ठीक करने में, या भलाई करने में। इसलिए यदि आप बड़ी भक्ति चाहते हैं, तो उसे किसी ऐसी रीति से विकसित करके पाने की बात मत सोचिए जिससे कभी भक्ति बढ़ी ही नहीं; अर्थात्, किसी मठ में जाकर, और मनुष्यजाति के सम्पर्क से अलग होकर। यदि प्रभु यीशु मसीह ने ऐसी परिस्थितियों को भक्ति के लिए अनुकूल समझा होता, तो उसने उन्हें वैसा ही ठहराया होता। परन्तु वह इससे अच्छा जानता था।

इसलिए उसने परिस्थितियों को ऐसा ठहराया है जैसी वे हैं, ताकि उसके लोगों के सामने परोपकार के हज़ार विषय, भलाई करने के हज़ार अवसर हों। और यदि वे अपने आप से बाहर निकलें, और अपने हृदयों को इन बातों की ओर लगाएँ, तो वे भक्ति में बढ़े बिना, और उनके प्रमाण बढ़ते हुए और सन्तोषजनक हुए बिना, नहीं रह सकते।

4. आत्म-परीक्षण का केवल एक ही भाग है जिसमें हम उचित रूप से इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपने आप को कोठरी में बन्द कर सकते हैं; अर्थात्, जब हम पीछे मुड़कर अपने पिछले आचरण के उद्देश्यों की शान्ति से जाँच करना चाहते हैं। ऐसी दशाओं में प्रायः यह आवश्यक होता है कि हम अपने विचारों को समेट लें और दूसरी बातों को अपने मन से बाहर रखें, ताकि अपने मन को पीछे मोड़कर उन कामों को देखें जो हमने किए हैं, और उन उद्देश्यों को जिनसे हम प्रेरित हुए थे। इसे प्रभावी ढंग से करने के लिए प्रायः एकान्त, और उपवास, और प्रार्थना का सहारा लेना आवश्यक होता है। कभी-कभी साहचर्य के नियमों को अपनी सहायता के लिए बुलाए बिना, जिस बात की हम जाँच करना चाहते हैं उसकी सजीव स्मृति जगाना असम्भव होता है।

हम बीते दृश्यों को स्मरण करने का प्रयत्न करते हैं, और सब कुछ गड़बड़ और अन्धकार-सा लगता है, जब तक हम किसी ऐसे सम्बद्ध विचार पर नहीं पहुँचते जो धीरे-धीरे सारी बात को ताज़ा करके हमारे सामने ले आता है। मान लीजिए मुझे किसी लेन-देन के विषय में अदालत में गवाह के रूप में बुलाया जाना है, तो कभी-कभी मैं जो कुछ हुआ था उसकी सजीव स्मृति केवल उस स्थान पर जाकर ही पा सकता हूँ, और तब सारी परिस्थितियाँ ऐसे उभर आती हैं मानो कल की ही बात हो। इसी प्रकार हम अपने पिछले इतिहास के किसी भाग की फिर से जाँच करने के सम्बन्ध में पा सकते हैं कि अपने आप को बन्द कर लेने से, न लम्बे मनन से, न उपवास से, न प्रार्थना से वह वापस आएगा, जब तक हम अपने आप को किन्हीं ऐसी परिस्थितियों में न डालें जो सम्बद्ध विचारों को जगा दें, और इस प्रकार उन भावनाओं को वापस ले आएँ जो पहले हमारी थीं।

मान लीजिए कोई पादरी पीछे मुड़कर देखना चाहता है कि वर्षों पहले उसने कैसा अनुभव किया था, और किस आत्मा से प्रचार किया था। वह जानना चाहता है कि उसके परिश्रम में कितनी सच्ची भक्ति थी।

वह अपनी कोठरी में घुटनों पर बहुत कुछ जान सकता है, उन प्रबल प्रभावों की सहायता से जो डाले जाते हैं

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