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कि कहीं वह स्वयं पापी तो नहीं, तो वह उस भरोसे और सरलता से उपदेश नहीं दे सकता, जिससे वह तब दे सकता यदि वह अनुभव करता कि उसके अपने पाँव चट्टान पर टिके हैं। कुछ लोगों का यह प्रिय विचार है कि पवित्र लोगों को नम्र बनाए रखने के लिए यह सबसे अच्छा है कि वे सदा अन्धकार में रहें।
मानो परमेश्वर की सन्तान यह जानकर घमण्डी हो जाएगी कि वह परमेश्वर की सन्तान है। जबकि, उसे परमेश्वर का अनादर करने से रोकने के लिए विश्व भर में सबसे भारी कारणों में से एक यही है कि वह जाने कि वह परमेश्वर की सन्तान है। जब कोई व्यक्ति चिन्तित मनोदशा में होता है, तो उसमें बहुत थोड़ा विश्वास हो सकता है, और जब तक यह प्रश्न तय न हो जाए, उसकी उपयोगिता व्यापक नहीं हो सकती।
III. इस माँग की व्यावहारिकता।
कुछ लोगों का यह प्रिय विचार है कि इस संसार में यह प्रश्न कभी तय नहीं हो सकता। यह आश्चर्यजनक है कि कितने ही लोग हैं जो अपने उन बड़े सन्देहों को, जो उन्हें सदा बने रहते हैं कि वे मसीही हैं या नहीं, मानो एक सद्गुण बना लेते हैं। सैकड़ों वर्षों से बहुत-से लोग इसे एक सन्देहजनक बात मानते आए हैं यदि धर्म का अंगीकार करनेवाला सन्देहों से भरा न हो। इसे लगभग निश्चित चिह्न माना जाता है कि वह अपने हृदय के विषय में कुछ नहीं जानता।
सदस्यता में प्रवेश के उम्मीदवारों से पूछे जानेवाले सर्वसामान्य प्रश्नों में से एक यह रहा है, “क्या आपको अपनी अच्छी दशा के विषय में कोई सन्देह है?” और यदि उम्मीदवार उत्तर देता है, “हाँ, मुझे बड़े सन्देह हैं,” तो यह सब बहुत ठीक समझा जाता है, और इसे इस बात का प्रमाण माना जाता है कि वह आत्मिक है, और अपने हृदय से गहराई से परिचित है, और उसमें बहुत दीनता है। परन्तु यदि उसे कोई सन्देह नहीं है, तो इसे इस बात का प्रमाण माना जाता है कि वह अपने हृदय के विषय में बहुत कम जानता है, और बहुत सम्भव है कि वह कपटी है। इस सब के विपरीत, मैं यह दृढ़ता से कहता हूँ कि इस पद में आज्ञा दिया गया कर्तव्य एक व्यावहारिक कर्तव्य है, और मसीही लोग अपने आप को ऐसी परख में डाल सकते हैं कि वे स्वयं को जान लें, और अपने वास्तविक चरित्र का सन्तोषजनक निश्चय प्राप्त कर लें।
1. यह इस पद की आज्ञा से स्पष्ट है, “अपने आप को परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं; अपने आप को जाँचो।” क्या कोई विश्वास करेगा कि परमेश्वर हम से यह माँग करता है कि हम अपने आप को परखें और अपने आप को जाँचें, और देखें कि हमारा सच्चा चरित्र क्या है, जबकि वह जानता है कि हमारे लिए अपना सच्चा चरित्र जान पाना कभी भी असम्भव है।
2. अपने आप को परखने और अपने चरित्र को जाँचने के लिए हमारे पास प्रमाण का सबसे उत्तम सम्भव माध्यम है, और वह है हमारी चेतना।
जिन तथ्यों के द्वारा हमारा चरित्र निर्धारित होना है, उनके विषय में चेतना सबसे ऊँचा सम्भव निश्चय देती है, और वह बड़ा प्रश्न तय हो जाता है। परमेश्वर के सामने हमारी दशा क्या है? परमेश्वर के सामने अपनी दशा का हमारे पास उसी प्रकार का प्रमाण हो सकता है, और होना चाहिए, जैसा हमारे पास अपने अस्तित्व का है; और वह है, चेतना। वरन्, हम इस प्रमाण को पाए बिना रह ही नहीं सकते।
चेतना निरन्तर यह गवाही देती रहती है कि हमारी मनोदशाएँ क्या हैं, और केवल इतना आवश्यक है कि चेतना जो गवाही देती है उस पर हम ध्यान दें, और हम इस प्रश्न को उतनी ही निश्चितता से तय कर सकते हैं जितनी निश्चितता से अपने अस्तित्व को।
3. परमेश्वर मनुष्यों को अपने हृदय में जो कुछ है उसे कार्य में प्रगट करने के ऐसे निरन्तर अवसर देता है कि लापरवाही को छोड़ और कुछ भी उन्हें इस विषय में निर्णय पर पहुँचने से नहीं रोक सकता।
