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भावना जगाने के योग्य हो, तो अनुभव न करना असम्भव है। मन इस प्रकार बना है कि वह अनुभव किए बिना रह ही नहीं सकता।
रुककर यह पूछना आवश्यक नहीं है, “क्या मैं अनुभव करता हूँ?”
मान लीजिए आप अपना हाथ आग के पास ले जाते हैं, तो क्या आपको रुककर यह प्रश्न पूछने की आवश्यकता है, “क्या मुझे सचमुच गरमाहट का अनुभव हो रहा है?” आप निश्चय ही जानते हैं कि आप अनुभव करते हैं। यदि आप अपना हाथ दीपक के पास से तेज़ी से निकाल लें, तो वह अनुभूति इतनी हल्की हो सकती है कि उस पर ध्यान ही न जाए, परन्तु वह कम वास्तविक नहीं होती, और यदि आप पर्याप्त सावधानी से ध्यान देते, तो आप उसे जान लेते। जहाँ छाप हल्की होती है, वहाँ अपनी ही चेतना पर ध्यान देने के लिए ध्यान का प्रयत्न आवश्यक होता है। इसी प्रकार मन की क्षणिक भावना इतनी हल्की हो सकती है कि वह आपके विचारों पर अधिकार न करे, और इस प्रकार आपके ध्यान से छूट जाए, परन्तु वह कम वास्तविक नहीं होती। परन्तु अपना हाथ एक मिनट के लिए दीपक की लौ में रखिए, तो वह अनुभूति ज़बरदस्ती आपका ध्यान अपनी ओर खींच लेगी, चाहे आप और किसी भी काम में लगे हों। यदि मन किसी ऐसी वस्तु पर टिका हो जो किसी भी प्रकार की भावनाएँ जगाने के योग्य हो, तो उन भावनाओं को कुछ मात्रा में अनुभव न करना असम्भव है; और यदि मन एकाग्रता से टिका हो, तो उन भावनाओं को इतनी मात्रा में अनुभव न करना असम्भव है कि हमें उनके अस्तित्व की चेतना हो जाए। ये सिद्धान्त आपको दिखाएँगे कि हमें अपने चरित्र का प्रमाण कैसे प्राप्त करना है, और किसी भी वस्तु के प्रति अपनी भावनाओं की वास्तविक दशा को कैसे जानना है। यह अपना ध्यान उस वस्तु पर तब तक टिकाए रखने से होता है जब तक हमारी भावनाएँ इतनी न जाग उठें कि हमें चेतना हो जाए कि वे क्या हैं।
मैं एक और बात बताऊँगा जिसे ध्यान में रखना चाहिए। यह निश्चित कर लीजिए कि जिन बातों पर आपका मन टिका है, और जिनके सम्बन्ध में आप अपने हृदय की दशा परखना चाहते हैं, वे वास्तविकताएँ हैं।
संसार में बहुत-सा काल्पनिक धर्म है, जिसे वे लोग, जो उसके अधीन हैं, वास्तविक समझने की भूल करते हैं। उनकी भावनाएँ ऊँची होती हैं, उनके मन बहुत उत्तेजित होते हैं, और भावना उस वस्तु के अनुरूप होती है जिस पर वे मनन कर रहे होते हैं। परन्तु धोखे का स्रोत यहीं है — वस्तु काल्पनिक है। बात यह नहीं कि भावना झूठी या काल्पनिक है। वह वास्तविक भावना है। बात यह नहीं कि भावना मन के सामने की वस्तु के अनुरूप नहीं है। वह पूरी तरह अनुरूप है। परन्तु वस्तु एक कल्पित कथा है।
उस व्यक्ति ने परमेश्वर के विषय में, या यीशु मसीह के विषय में, या उद्धार के विषय में ऐसी धारणा बना ली है जो सत्य से बिलकुल हटकर है, और इन कल्पनाओं को देखकर उसकी भावनाएँ वैसी ही होती हैं जैसी सच्ची वस्तुओं के प्रति होतीं, यदि उसके पास सच्चा धर्म होता, और इस प्रकार वह धोखे में पड़ जाता है। निस्सन्देह संसार में झूठी आशा और झूठे अंगीकारों का एक बड़ा स्रोत यही है।
V. अब मैं कुछ ऐसी बातें बताऊँगा जिनके सम्बन्ध में अपने मन की दशा को परखना आपका कर्तव्य है।
1. पाप — आपके अपने विशेष पाप नहीं, बल्कि स्वयं पाप, परमेश्वर के विरुद्ध किए गए अपराध के रूप में।
आपको यह नहीं समझना चाहिए कि केवल अपने मन में पाप के प्रति तीव्र अस्वीकृति की भावना पाकर आप अपने हृदय की सच्ची दशा तक पहुँच जाएँगे। यह तो एक बुद्धिमान प्राणी के स्वभाव का, बुद्धिमान प्राणी होने के नाते, अंग है। सभी बुद्धिमान प्राणी पाप के प्रति अस्वीकृति का अनुभव करते हैं, जब उसे अमूर्त रूप में, और अपनी स्वार्थपूर्ण तृप्ति से अलग करके देखा जाए। निस्सन्देह शैतान भी इसे अनुभव करता है। जब पाप को अमूर्त रूप में देखा जाए, तो शैतान पाप के प्रति जिब्राईल से अधिक स्वीकृति का अनुभव नहीं करता। वह पापियों को दोषी ठहराता है और उनके आचरण की निन्दा करता है, और जब कभी उसके पास उनके कामों से प्रसन्न होने का कोई स्वार्थपूर्ण कारण नहीं होता, तो वह उनसे घृणा करता है। आप पृथ्वी पर के दुष्टों में भी प्रायः पाप के प्रति
