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फिर कभी जागृति के लिए उभार नहीं सकती। इसके ठीक विपरीत वे कलीसियाएँ और व्यक्ति हैं जिनमें सच्चा पश्चाताप है। उन्हें एक के बाद एक जागृतियों में से होकर गुज़रने दीजिए, और आप पाएँगे कि वे अधिकाधिक कोमल और नम्र होते जाते हैं, यहाँ तक कि वे ऐसी दशा में पहुँच जाते हैं कि यदि वे जागृति के लिए तुरही का शब्द सुनें, तो वे तुरन्त प्रज्वलित होकर दमक उठते हैं, और काम के लिए तैयार हो जाते हैं।
यह भेद उतना ही बड़ा है जितना उजियाले और अन्धकार के बीच का भेद। यह कलीसियाओं और कलीसिया के सदस्यों में सब कहीं देखा जा सकता है। आप यह सिद्धान्त उन पापियों में प्रकट होता देखते हैं, जो बार-बार जागृतियों में से होकर गुज़रने के बाद, अन्त में सारे धर्म का ठट्ठा करने और उसकी निन्दा करने लगते हैं, और यद्यपि आकाश उनके सिरों के ऊपर दया के बादलों से छाया रहता है, तौभी वे उस पर ध्यान नहीं देते, वरन् उसे ठुकरा देते हैं। कलीसियाओं और सदस्यों में भी ऐसा ही है; यदि उनमें सच्चा पश्चाताप नहीं है, तो हर नई उत्तेजना हृदय को कठोर कर देती है और उन तक सत्य का पहुँचना और भी कठिन बना देती है।
9. यह विवेक को दाग देता है।
ऐसे लोग आरम्भ में, जब-जब सत्य उनके मन पर बिजली की नाईं कौंधता है, व्याकुलता में पड़ जाने को प्रवृत्त होते हैं। सम्भव है उन्हें सच्चे मसीही जितना पाप का बोध न हो। परन्तु सच्चा
मसीही ठीक उसी समय शान्ति से भर जाता है जब पाप के बोध के कारण उसके आँसू बह रहे होते हैं। और बोध का हर दोहराया हुआ समय उसे अधिकाधिक चौकस, कोमल और सावधान बनाता जाता है, यहाँ तक कि उसका विवेक उसकी आँख की पुतली के समान इतना कोमल हो जाता है कि बुराई का आभास मात्र भी उसे ठेस पहुँचाता है। परन्तु दूसरे प्रकार का शोक, जो पाप के हार्दिक त्याग की ओर नहीं ले जाता, हृदय को पहले से अधिक कठोर छोड़ जाता है, और अन्त में विवेक को मानो जलते हुए लोहे से दाग देता है। यह शोक मृत्यु उत्पन्न करता है।
10. यह आशा के आधार के रूप में यीशु मसीह को ठुकरा देता है।
सुधार और शोक पर, या किसी और बात पर निर्भर रहने के कारण, यह यीशु मसीह पर ऐसा कोई भरोसा उत्पन्न नहीं करता कि मसीह का प्रेम उस व्यक्ति को विवश करे कि वह जीवन भर मसीह के लिए परिश्रम करे।
11. यह क्षणिक और अस्थायी होता है।
इस प्रकार के पश्चाताप पर आगे चलकर पछताना निश्चित है। कुछ समय बाद आप पाएँगे कि ऐसे लोग अपनी उन गहरी भावनाओं पर लज्जित होने लगते हैं जो उन्हें हुई थीं। वे उनकी चर्चा नहीं करना चाहते, और यदि वे उनकी बात करते भी हैं तो सदा हल्केपन और ठण्डेपन से। सम्भव है जागृति के समय वे खूब भाग-दौड़ करते रहे हों, और किसी के भी समान उत्साह से लगे हुए दिखाई दिए हों, और बहुत सम्भव है कि जो कुछ किया गया उसमें वे हर बात में अति करनेवालों में रहे हों। परन्तु अब जागृति समाप्त हो गई है, और आप पाते हैं कि वे नए तरीकों के विरोधी हो गए हैं, और पीछे लौट रहे हैं, और अपने उत्साह पर लज्जित हैं। वास्तव में वे अपने पश्चाताप पर ही पछताते हैं।
ऐसे लोग कलीसिया में सम्मिलित हो जाने के बाद इस बात पर लज्जित होंगे कि वे चिन्तित खोजियों की बेंच पर आए थे। जब जागृति का चरम समय बीत जाता है, तो वे बहुत अधिक जोशीले होने के विरुद्ध, और धर्म में अधिक गम्भीर और सुसंगत ढंग अपनाने की आवश्यकता के विषय में बातें करने लगेंगे।
यही रहस्य है—उन्हें ऐसा पश्चाताप हुआ था जिस पर उन्होंने बाद में पछतावा किया।
कभी-कभी आप ऐसे लोगों को पाते हैं जो किसी जागृति में मन-परिवर्तन का अंगीकार करते हैं, और फिर उन्हीं तरीकों, साधनों और सिद्धान्तों के विरोधी हो जाते हैं, जिनके द्वारा, उनके अपने अंगीकार के अनुसार, उनका मन-परिवर्तन हुआ था।
सच्चे मसीही के साथ ऐसा नहीं होता। वह अपने पश्चाताप पर कभी लज्जित नहीं होता। जिस बात पर लज्जित होने का विचार वह सबसे अन्त में करेगा, वह है भावनाओं की वह उत्तेजना जो उसने किसी जागृति में अनुभव की थी।
