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टिप्पणियाँ I. आप देखते हैं कि अन्य सब शिक्षाओं का ऐसी मंडली पर क्या परिणाम होता है जहाँ कोई ईश्वरीय प्रभाव अनुभव नहीं किया जाता।
वे कलीसिया को कर्तव्य का बोध तो करा सकती हैं, परन्तु पवित्रीकरण कभी उत्पन्न नहीं करेंगी। वे हृदय को कठोर तो कर सकती हैं, परन्तु उसे कभी बदलेंगी नहीं। ईश्वरीय प्रभाव के बिना, वे मरने के लिये मृत्यु की गन्ध ही हैं।
II. आप देखते हैं कि धार्मिक शिक्षा के सब उपयुक्त साधनों का, जो हमारे वश में हैं, प्रयोग करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे वह माध्यम हैं जिसके द्वारा परमेश्वर का आत्मा मन तक ईश्वरीय प्रकाश पहुँचाता है।
कोई कारण नहीं कि हम अपने वश के साधनों का प्रयोग न करें, और धर्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिये अपनी स्वाभाविक शक्तियों को उतनी ही विश्वासयोग्यता से न लगाएँ, मानो हम ईश्वरीय प्रभाव के बिना ही सारे विषय को समझ सकते हों। और यदि हम साधनों का प्रयोग नहीं करते, जब वे हमारे वश में हों, तो हमारे पास ईश्वरीय सहायता की आशा रखने का कोई कारण नहीं। जब हम अपनी सहायता करते हैं, तो परमेश्वर हमारी सहायता करता है। जब हम इन बातों को समझने के लिये अपनी स्वाभाविक शक्तियों का प्रयोग करते हैं, तो हम आशा कर सकते हैं कि परमेश्वर हमें प्रकाशित करेगा।
प्रकाश से अपनी आँखें फेर लेना, और फिर प्रार्थना करना कि हम देखने योग्य बनाए जाएँ, परमेश्वर की परीक्षा करना है। III. जो लोग स्वयं परमेश्वर से सिखाए गए बिना धर्म की बातें सिखाने का प्रयत्न करते हैं, वे अन्धों के अन्धे अगुवे हैं।
विद्या की कोई भी मात्रा, या धर्मविज्ञान की शिक्षण-पद्धति के विषय में भेद करने की कोई भी शक्ति, किसी मनुष्य को धर्म का सफल शिक्षक कभी नहीं बनाएगी, जब तक कि उसे पवित्र आत्मा की प्रकाश देनेवाली सामर्थ का आनन्द प्राप्त न हो। यदि वह समझता है कि वह इसके बिना बाइबल को समझता है, तो वह अन्धा है, और यदि वह धर्म सिखाने का बीड़ा उठाता है, तो वह अपने आप को, और उन सब को जो उस पर निर्भर हैं, धोखा देता है, और दोनों एक साथ गड़हे में गिर पड़ेंगे।
IV. यदि कोई व्यक्ति स्वर्ग से भेजे गए पवित्र आत्मा के साथ सुसमाचार सिखाता है, तो उसकी बात समझी जाएगी।
हो सकता है कि वह स्वयं सुसमाचार को समझता हो, और फिर भी अपने सुननेवालों को न समझा पाए, क्योंकि पवित्र आत्मा उस पर जैसे भेजा गया है, वैसे उन पर नहीं भेजा गया। परन्तु यदि परमेश्वर का आत्मा उन पर है, तो ठीक उसी अनुपात में जिसमें वह स्वयं सुसमाचार के वास्तविक अर्थ को समझता है, वह अपने सुननेवालों को उसे समझा देगा।
V. सुसमाचार का प्रचार करते समय, पादरियों को ऐसे पाठ-वचनों का कभी प्रयोग नहीं करना चाहिए, जिनका अर्थ उन्हें परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नहीं सिखाया गया है।
उन्हें ऐसे खण्डों को समझाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए, जिनके विषय में उन्हें यह निश्चय न हो कि पवित्र आत्मा ने उन्हें उनका अर्थ सिखाया है। यह ढिठाई है। और उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता भी नहीं, क्योंकि माँगने से वे सदा आत्मा की शिक्षाएँ पा सकते हैं। परमेश्वर ईश्वरीय प्रकाश देने के लिये सदा उससे अधिक तत्पर है, जितना कोई सांसारिक माता-पिता अपने बच्चे को रोटी देने के लिये; और यदि वे वैसे माँगें जैसे कोई भूखा बच्चा अपनी माँ से रोटी माँगता है, तो वे सदा वह सारा प्रकाश पा सकते हैं जिसकी उन्हें आवश्यकता है। यह बात प्रचारकों पर भी, और सब्त-स्कूलों तथा बाइबल-कक्षाओं के शिक्षकों पर भी लागू होती है। यदि उनमें से कोई स्वयं सिखाए गए बिना पवित्रशास्त्र सिखाने का प्रयत्न करे,
