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भलाई करने पर लगा है, किसी भी धन को खर्च करने में उतना आनन्द नहीं पाता जितना उस धन में जो वह मसीह के राज्य को बढ़ाने के लिए देता है। यदि वह सचमुच भक्त है, तो वह जानता है कि अपने धन का इससे अच्छा उपयोग वह कर ही नहीं सकता। इतना ही नहीं, जब उससे भलाई करने के इतने अवसर हैं, तो उसे किसी और काम में धन लगाने के लिए विवश होना खेदजनक लगता है।
मैं चाहता हूँ कि आप जो यहाँ हैं, इस बात पर ध्यान दें। यह देखना आसान है कि यदि किसी व्यक्ति का मन किसी वस्तु पर बहुत लगा हो, तो जितना धन वह उस उद्देश्य के लिए बचा सकता है, वह सब उसे सबसे अधिक प्रिय लगता है, और जिस उद्देश्य पर उसका मन लगा है उसके लिए वह दूसरे कामों में से जितना अधिक बचा सके, उतना ही अधिक वह प्रसन्न होता है। यदि किसी व्यक्ति को धार्मिक कामों के लिए धन देना कठिन लगता है, तो यह देखना आसान है कि उसका मन उन पर नहीं लगा है। यदि लगा होता, तो वह अपना धन आनन्द के साथ देता।
आप ऐसे मनुष्य के विषय में क्या सोचेंगे जो धर्म की उन्नति के लिए धन देने के विरोध में खड़ा हो जाए, और मिशन के काम के विषय में, और धन की इतनी माँगें होने के विषय में, कलीसिया में उत्तेजना फैलाए, जबकि उसने कभी पाँच डॉलर भी न दिए हों? यह इस बात का पूर्ण प्रमाण होगा कि उसका मन सचमुच मसीह के काम पर नहीं लगा था; यदि लगा होता, तो वह उसके लिए अपना धन पानी की तरह खुले हाथ से देता; और जितना अधिक वह उसके लिए दे पाता, उतना ही अधिक वह प्रसन्न होता।
23. इस प्रकार के लोग जागृतियों को बढ़ावा देने में आगे नहीं रहते।
यह उनका बड़ा उद्देश्य नहीं है। उन्हें सदा इस काम में घसीटकर लाना पड़ता है। जब कोई जागृति आरम्भ हो चुकी होती है, और आगे बढ़ चुकी होती है, और उत्साह बहुत बढ़ जाता है, तब वे आ जाते हैं और उसमें लगे हुए दिखाई देते हैं। परन्तु आप उन्हें कभी अगुवाई करते, या बाकी लोगों से आगे निकलकर बढ़ते, और बाकी भाइयों से यह कहते नहीं देखते, आओ, हम प्रभु के लिए कुछ करें।
24. वास्तव में, वे पापियों को परमेश्वर की ओर फेरते नहीं।
वे विभिन्न प्रकार से भलाई का साधन बन सकते हैं, और इसी प्रकार शैतान भी भलाई का साधन बन सकता है।
परन्तु सामान्य रूप से, वे पापियों को आग में से खींच नहीं निकालते। और इसका कारण यह है कि यह उनका बड़ा उद्देश्य नहीं है। आपकी क्या दशा है? क्या आप सचमुच पापियों का मन फिराने में सफल होते हैं? क्या कोई ऐसा है जो आपको अपने मन-परिवर्तन का साधन मानेगा? यदि आप सचमुच इस काम में लगे होते, तो आप इसे किए बिना संतुष्ट होकर चैन से न बैठ पाते, और आप इस काम में इतनी गंभीरता से और ऐसी वेदनापूर्ण प्रार्थना के साथ लग जाते कि आप इसे कर ही डालते।
25. जब वे पाप को देखते हैं तो बहुत दुःख प्रगट नहीं करते।
वे उसे डाँटते नहीं। वे ऐसे दृश्यों में घुल-मिल जाना पसन्द करते हैं जहाँ पाप किया जाता है। वे ऐसी जगह रहना पसन्द करते हैं जहाँ वे व्यर्थ बातचीत सुन सकें, और उसमें शामिल भी हो सकें। वे सांसारिक संगति और सांसारिक पुस्तकें पसन्द करते हैं। उनकी आत्मा सांसारिक है। “उस वस्त्र से भी घृणा” करने के बजाय “जो शरीर के द्वारा कलंकित हो गया है,” वे पाप की सीमाओं के आस-पास मँडराना पसन्द करते हैं, मानो उन्हें उसमें प्रसन्नता मिलती हो।
26. जागृतियों, मिशनों इत्यादि के प्रकाशित विवरणों में वे बहुत ही कम रुचि लेते हैं।
यदि किसी मिशन पर कठोर परीक्षा आती है, तो वे न उसे जानते हैं और न अनुभव करते हैं। यदि मिशन उन्नति करते हैं, तो उन्हें कभी इसका पता नहीं चलता, वे इसमें कोई रुचि नहीं लेते। बहुत सम्भव है कि वे कोई भी धार्मिक पत्र मँगवाते ही न हों। या यदि मँगवाते हैं, तो जब वे उसे पढ़ने बैठते हैं और किसी जागृति के समाचार पर पहुँचते हैं, तो उसे छोड़कर
