व्याख्यान 73 (253 में से)

1. व्यापार में हमें इस संसार के सदृश न बनने का पहला कारण यह है,

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1. व्यापार में हमें इस संसार के सदृश न बनने का पहला कारण यह है, कि संसार का सिद्धान्त सर्वोपरि स्वार्थ का सिद्धान्त है। व्यापार के काम-धन्धे में यह सर्वत्र सत्य है। संसार में व्यापार का सारा चलन सर्वोपरि और निरे स्वार्थ के सूत्रों से ही संचालित और नियमित होता है।

वह परमेश्वर की आज्ञाओं, या परमेश्वर की महिमा, या अपने संगी मनुष्यों के कल्याण का तनिक भी ध्यान रखे बिना नियमित होता है। व्यापारियों के बीच सामान्य रूप से प्रचलित व्यापार के सूत्र, और व्यापारियों की आदतें और रीतियाँ, सब की सब सर्वोपरि स्वार्थ पर आधारित हैं।

कौन नहीं जानता कि सौदे करते समय संसार के व्यापारी अपने ही हित का विचार करते हैं, और अपना ही लाभ खोजते हैं, न कि उन लोगों का लाभ जिनसे वे लेन-देन करते हैं?

किसने कभी किसी सांसारिक व्यापारी के विषय में सुना है कि वह उन लोगों के लाभ के लिए सौदे करता और व्यापार करता हो जिनसे उसका लेन-देन है? नहीं, वह सदा अपने ही लाभ के लिए होता है। और क्या मसीहियों को भी ऐसा ही करना है? उनसे इसके ठीक विपरीत सिद्धान्त पर चलने की माँग की गई है: “कोई अपनी ही भलाई को न ढूँढ़े, वरन औरों की।” उनसे यह माँग की गई है कि वे यीशु

मसीह के उदाहरण का अनुकरण करें। क्या उसने कभी अपने लाभ के लिए सौदे किए? और क्या उसके अनुयायी संसार के सिद्धान्त को अपना सकते हैं, एक ऐसा सिद्धान्त जिसमें नरक के बीज छिपे हैं! यदि मसीहियों को ऐसा ही करना है, तो क्या यह सोचना पृथ्वी की सबसे बड़ी कल्पना नहीं है कि संसार कभी सुसमाचार की ओर फिरेगा।

2. उनसे यह माँग की गई है कि वे संसार के सदृश न बनें, क्योंकि संसार के सदृश बनना परमेश्वर या मनुष्य के प्रेम से पूर्णतया असंगत है।

यह सारी व्यवस्था केवल स्वयं के प्रेम को ही मानती है। व्यापारियों के सब वर्गों में जाकर देखिए, उस मनुष्य से लेकर जो गली के नुक्कड़ पर फुटपाथ पर मिठाई बेचता है, संयुक्त राज्य अमेरिका के सबसे बड़े थोक व्यापारी या आयातक तक, और आप पाएँगे कि सब में एक ही सूत्र चलता है, कि “जितना सस्ता हो सके ख़रीदो, और जितना महँगा हो सके बेचो, पहले अपना भला देखो,” और जहाँ तक ईमानदारी के नियम अनुमति दें, सदा वह सब करो जिससे आपका अपना हित बढ़े, दूसरों के हित का चाहे जो हो। भक्तिहीन लोग इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि संसार में व्यापार इन्हीं सूत्रों पर चलता है। जो मनुष्य इस मार्ग पर चलता है, उसे सब लोग व्यापारिक सिद्धान्तों पर व्यापार करनेवाला मानते हैं। अब, क्या ये सूत्र पवित्रता से, परमेश्वर के प्रेम या मनुष्य के प्रेम से, सुसमाचार की आत्मा या यीशु मसीह के उदाहरण से मेल खाते हैं? क्या कोई मनुष्य इन सिद्धान्तों में संसार के सदृश बनकर भी परमेश्वर से प्रेम रख सकता है? असम्भव! कोई दो बातें इससे अधिक भिन्न नहीं हो सकतीं। तो मसीहियों को किसी भी रीति से संसार के व्यापारिक सूत्रों के अनुसार नहीं चलना है।

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