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पाप से प्रेम करते रहे, और जब अवसर मिला, वे उसकी ओर लौट गए, जैसे धोई हुई सूअरनी कीचड़ में लोटने के लिए फिर चली जाती है, क्योंकि वह सदा सूअरनी ही थी।
मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को भली-भाँति समझ लें। धर्म में वे सब झटके और उतार-चढ़ाव, जो आप इतने अधिक देखते हैं, उनकी जड़ यहीं है। लोग जागृत होते हैं, और उन्हें पाप का बोध होता है, और कुछ समय बाद वे आशा पा लेते हैं और झूठी निश्चिन्तता में जम जाते हैं, और फिर वे चल देते हैं। शायद वे इतनी सावधानी रखें कि कलीसिया से निकाले न जाएँ, परन्तु पापों की नींव नहीं तोड़ी गई है, और वे अपनी पुरानी चाल पर लौट आते हैं। जो स्त्री पहनावे से प्रेम करती थी वह अब भी उससे प्रेम करती है; और धीरे-धीरे अपने फीतों और तड़क-भड़क वाले गहनों की ओर लौट आती है। जो मनुष्य धन से प्रेम करता था वह अब भी उससे प्रेम करता है, और शीघ्र ही अपनी पुरानी चाल पर फिसल जाता है, और कारोबार में डुबकी लगा देता है, और संसार के पीछे उतनी ही उत्सुकता और लगन से दौड़ता है जितनी कलीसिया में सम्मिलित होने से पहले दौड़ता था।
समाज के सब वर्गों में जाकर देखिए, और यदि आपको पूरे मन-परिवर्तन मिलें, तो आप पाएँगे कि मन-परिवर्तन से पहले उनके सबसे अधिक घेरनेवाले पाप अब उनसे सबसे दूर हैं। सच्चा नया विश्वासी अपने पुराने घेरनेवाले पाप में गिरने की सबसे कम सम्भावना रखता है, क्योंकि वह उससे सबसे अधिक घिन करता है। परन्तु यदि वह धोखे में है और सांसारिक मन का है, तो वह सदा उन्हीं पापों की ओर लौटने की प्रवृत्ति रखता है। जो स्त्री पहनावे से प्रेम करती है वह फिर से अपने सारे ठाट-बाट के साथ निकल आती है, और पहले की तरह शान दिखाती है। पाप का सोता नहीं तोड़ा गया था। उन्होंने अपने मन से अधर्म को निकालकर शुद्ध नहीं किया, बल्कि सारे समय वे अपने मन में अनर्थ बात को जगह देते रहे।
5. यह एक बलपूर्वक कराया गया सुधार है।
झूठे पश्चाताप से उत्पन्न सुधार न केवल आंशिक सुधार, और अस्थायी सुधार है, बल्कि वह बलपूर्वक और दबाव में कराया गया भी है। जिसके पास सच्चा पश्चाताप है उसका सुधार मन से होता है; उसमें पाप करने की प्रवृत्ति अब नहीं रहती। उसमें बाइबल की प्रतिज्ञा पूरी होती है। वह वास्तव में पाता है कि “उसके मार्ग मनभाऊ हैं, और उसके सब मार्ग कुशल के हैं।” वह अनुभव करता है कि उद्धारकर्ता का जूआ सहज और उसका बोझ हल्का है।
उसने अनुभव किया है कि परमेश्वर की आज्ञाएँ कठिन नहीं, बल्कि आनन्ददायक हैं। वे सोने से वरन बहुत कुन्दन से भी बढ़कर मनोहर हैं; वे मधु से और टपकनेवाले छत्ते से भी बढ़कर मधुर हैं।
परन्तु यह नकली प्रकार का पश्चाताप बहुत भिन्न है: यह व्यवस्था-सम्बन्धी पश्चाताप है, जो प्रेम का नहीं बल्कि भय का परिणाम है; एक स्वार्थी पश्चाताप है, जो पाप से आज्ञाकारिता की ओर स्वतंत्र, स्वेच्छा से और हृदय से होनेवाले परिवर्तन के सिवा और कुछ भी है। यदि यहाँ कोई व्यक्ति हैं जिनमें इस प्रकार का पश्चाताप है, तो आप पाएँगे — आपको यह बोध है — कि आप अपनी इच्छा से, इसलिए कि आप उससे बैर रखते हैं, पाप से दूर नहीं रहते, बल्कि दूसरे कारणों से।
यह पाप से घिन या कर्तव्य के प्रेम के कारण कम, और विवेक की रोक-टोक के कारण, या इस भय के कारण अधिक है कि कहीं आप अपना प्राण न खो दें, या अपनी आशा न खो दें, या अपनी प्रतिष्ठा न खो दें।
ऐसे लोगों को कर्तव्य करवाने के लिए सदा पवित्रशास्त्र के किसी स्पष्ट वचन से ठेलना पड़ता है, नहीं तो वे पाप के लिए सफ़ाई देंगे, और कर्तव्य से कतराएँगे, और सोचेंगे कि जैसा वे करते हैं वैसा करने में कोई बड़ी हानि नहीं। इसका कारण यह है कि वे अपने पापों से प्रेम करते हैं, और यदि परमेश्वर की कोई ऐसी स्पष्ट आज्ञा न हो जिसका सामना करने का वे साहस न करें, तो वे उन्हें करते रहेंगे। सच्चे पश्चाताप के साथ ऐसा नहीं है। यदि कोई बात प्रेम की महान व्यवस्था के विरुद्ध दिखे, तो जिस व्यक्ति में सच्चा पश्चाताप है वह स्वाभाविक रूप से उससे घिन करेगा और उससे बचेगा, चाहे उसके विषय में उसके पास परमेश्वर की कोई स्पष्ट आज्ञा
