व्याख्यान 38 (253 में से)

सामान्यतः नहीं: क्योंकि जब कोई व्यक्ति नशे में होता है तो उसका मन ठिकाने नहीं रहता। ऐसी दशाएँ हो सकती हैं जहाँ यह

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अध्याय 4: डाँटना — एक मसीही कर्तव्य।

सामान्यतः नहीं: क्योंकि जब कोई व्यक्ति नशे में होता है तो उसका मन ठिकाने नहीं रहता। ऐसी दशाएँ हो सकती हैं जहाँ यह दूसरों को चेतावनी देने के उद्देश्य से उचित हो। परन्तु जहाँ तक स्वयं मतवाले का सम्बन्ध है, सामान्य नियम के रूप में, यह उचित नहीं है। फिर भी ऐसी बहुत सी दशाएँ हैं जहाँ किसी मनुष्य को नशे की दशा में भी दी गई ताड़ना ने उसके मन को ऐसा पकड़ लिया कि उसका नशा उतर गया, और वह अपने पशु-समान पाप से फिर गया।

4. क्या हमें बड़े लोगों को, और समाज में हम से ऊपर के लोगों को, जो हमें और हमारी ताड़नाओं को तुच्छ दृष्टि से देख सकते हैं, डाँटना चाहिए?

इससे आपका कर्तव्य नहीं बदलता। “अपने पड़ोसी को अवश्य डाँटना, और उसके कारण पाप का भार न उठाना।” आपको उस सम्बन्ध का ध्यान रखना चाहिए जिसमें वह खड़ा है, और उसके अनुसार उससे व्यवहार करना चाहिए। परन्तु फिर भी, यदि वह परमेश्वर के विरुद्ध पाप करता है, तो उचित रीति से उसे डाँटना आपका कर्तव्य है।

टिप्पणियाँ 1. लोगों के पापों की चर्चा मत कीजिए, बल्कि जाकर उन्हें डाँटिए।

लोगों की पीठ पीछे उनके पापों की चर्चा करना बहुत आम बात है, परन्तु यह बड़ी दुष्टता है। यदि आप किसी व्यक्ति के पापों के विषय में बात करना चाहते हैं, तो जाइए और उन्हीं के विषय में उससे बात कीजिए, और उसे उनसे पश्चाताप करने और उन्हें त्यागने के लिए मनाने का यत्न कीजिए। उसकी पीठ पीछे जाकर दूसरों से उसके विरुद्ध बातें न कीजिए, और उसे बिना चेतावनी पाए अपने पापों में नरक की ओर बढ़ते रहने के लिए न छोड़िए।

2. धर्म का अंगीकार करनेवालों में से कितने कम इतने विवेकशील हैं कि इस कर्तव्य का पालन करें।

मेरा अनुमान है कि इस नगर में हज़ारों ऐसे हैं, जो ऐसा करने का कभी विचार तक नहीं करते। हाँ; धर्म का अंगीकार करनेवाले परमेश्वर की इस स्पष्ट, और प्रबल शब्दों में दी गई आज्ञा के प्रति आदतन अवज्ञा में जीते हैं। और फिर वे आश्चर्य करते हैं कि उनमें प्रार्थना की आत्मा क्यों नहीं है, और अधिक जागृतियाँ क्यों नहीं होतीं! आश्चर्य!

3. देखिए, क्यों इतने कम लोग धर्म का आनन्द उठाते हैं।

वे इस आज्ञा की आदतन उपेक्षा में जीते हैं, बहाने बनाते हुए, जबकि परमेश्वर ने कहा है कि कोई बहाना नहीं होगा। और वे धर्म का आनन्द कैसे उठा सकते हैं? यदि परमेश्वर ऐसे विश्वासघाती अंगीकार करनेवालों को धर्म के आनन्द दे दे, तो समस्त विश्व परमेश्वर के विषय में क्या सोचेगा?

4. हम देखते हैं कि धर्म का अंगीकार करनेवालों का बहुत बड़ा भाग परमेश्वर की माँगों की अपेक्षा अपनी प्रतिष्ठा की अधिक चिन्ता करता है।

इसका प्रमाण यह है, कि छिद्रान्वेषी कहलाए जाने का, या पाप को डाँटकर शत्रु बना लेने का जोखिम उठाने के बजाय, वे मनुष्यों को बिना डाँटे पाप में बढ़ते रहने देंगे, इसके बावजूद कि परमेश्वर कहता है,

“अपने पड़ोसी को अवश्य डाँटना।” परन्तु यदि मैं उसके पाप के लिए उसे डाँटूँ तो वह मुझ से अप्रसन्न हो जाएगा। “उसे अवश्य डाँटना,” यहोवा कहता है। इससे प्रकट होता है कि वे परमेश्वर से अधिक मनुष्यों से डरते हैं। मनुष्य को अप्रसन्न करने के डर से, वे परमेश्वर को अप्रसन्न करने का जोखिम उठाते हैं। हाँ, मनुष्यों के पापों को डाँटकर उनकी अप्रसन्नता मोल लेने की अपेक्षा, वे परमेश्वर की सबसे स्पष्ट और सबसे प्रबल आज्ञाओं में से एक में, पूरी रीति से परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं।

5. जब हम किसी मनुष्य को उसके पाप के लिए डाँटते हैं, तो उसे हम से यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि उसके मामले में हाथ डालना हमारा काम नहीं है।

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