व्याख्यान 141 (253 में से)

इसी बात के समर्थन में वचनों को उद्धृत करता और समझाता रह सकता हूँ, और यह दिखा सकता हूँ कि सारा शुद्ध धर्म

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इसी बात के समर्थन में वचनों को उद्धृत करता और समझाता रह सकता हूँ, और यह दिखा सकता हूँ कि सारा शुद्ध धर्म निःस्वार्थ परोपकार में ही है।

आगे बढ़ने से पहले, मैं इस विचार के विरुद्ध कई आपत्तियों का उल्लेख करना चाहता हूँ, जो आपके मन में उठ सकती हैं। मैं यह विशेष रूप से इसलिये करता हूँ क्योंकि आप में से कुछ लोग ठीक यहीं ठोकर खा सकते हैं, और अन्त में यह धारणा बना सकते हैं कि यह ठीक है कि हमारा धर्म अपने ही उद्धार को अपना बड़ा लक्ष्य बनाने में हो।

आपत्ति 1. “यदि आनेवाले क्रोध के भय से प्रभावित होना स्वार्थ है, तो परमेश्वर के वचन की धमकियाँ क्यों दी गई हैं?”

इस आपत्ति के बहुत से उत्तर दिए जा सकते हैं।

उत्तर। मनुष्य की बनावट ऐसी है कि वह अपने अस्तित्व के नियमों के अनुसार पीड़ा से डरता है। इसलिये पवित्रशास्त्र की धमकियाँ बहुत से उद्देश्य पूरे करती हैं। एक यह है कि वे स्वार्थी मन का ध्यान खींचें, और उसे उन कारणों की जाँच करने की ओर ले जाएँ जो परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी आज्ञा मानने के लिये हैं। जब पवित्र आत्मा इस प्रकार ध्यान खींच लेता है, तब वह पापी के विवेक को जगाता है, और उसे परमेश्वर के आधीन होने की उचितता और कर्तव्य पर विचार करने और निर्णय करने में लगाता है।

आपत्ति 2. “जब परमेश्वर ने हमें सुख और दुःख की ये ग्रहणशक्तियाँ दी हैं, तो क्या उनसे प्रभावित होना गलत है?”

उत्तर। यह न तो ठीक है और न गलत। इन ग्रहणशक्तियों का कोई नैतिक स्वरूप नहीं है।

यदि आज रात मेरे पास समय होता, तो मैं आपके लिये सब कुछ स्पष्ट कर सकता था। नैतिकता में कामों का एक ऐसा वर्ग है जो विवेकपूर्ण सावधानी के विचारों की श्रेणी में आता है।

उदाहरण के लिये: मान लीजिए आप एक खड़ी चट्टान के किनारे खड़े हैं, जहाँ से यदि आप अपने आप को नीचे गिरा दें, तो निश्चय ही आपकी गर्दन टूट जाएगी। आपको इसके विरुद्ध चेतावनी दी जाती है। अब, यदि आप चेतावनी पर ध्यान न दें, वरन् अपने आप को नीचे गिरा दें, और अपना प्राण नष्ट कर दें, तो वह पाप होगा। परन्तु उस पर ध्यान देना कोई सद्गुण नहीं है। यह केवल विवेकपूर्ण सावधानी का एक काम है। खतरे से बचने में कोई सद्गुण नहीं है, यद्यपि बहुधा उससे न बचना पाप हो सकता है। मनुष्यों के लिये परमेश्वर के क्रोध को ललकारना पाप है। परन्तु नरक से डरना पवित्र नहीं है, उसी प्रकार जैसे चट्टान से गिरकर गर्दन टूटने का भय पवित्र नहीं है। यह केवल हमारी बनावट की प्रेरणा है।

आपत्ति 3. “क्या बाइबल अपनी प्रसन्नता की खोज करना हमारा तात्कालिक कर्तव्य नहीं ठहराती?”

उत्तर। अपनी प्रसन्नता की, उसके वास्तविक मूल्य के अनुसार, खोज करना पाप नहीं है। इसके विपरीत, ऐसा करना एक वास्तविक कर्तव्य है। और जो ऐसा करने में लापरवाही करता है, वह पाप करता है। दूसरा उत्तर यह है कि यद्यपि अपनी प्रसन्नता की खोज करना ठीक है, और मन के स्वभावगत नियम हमसे अपनी प्रसन्नता का ध्यान रखने की माँग करते हैं, तौभी हमारी बनावट यह संकेत नहीं करती कि अपनी प्रसन्नता को सर्वोच्च भलाई मानकर उसके पीछे लगना ठीक है। मान लीजिए कोई यह तर्क दे कि क्योंकि हमारी बनावट को भोजन की आवश्यकता है, इसलिये भोजन को सर्वोच्च भलाई मानकर उसकी खोज करना ठीक है—क्या यह तर्क ठीक होगा? निश्चय ही नहीं; क्योंकि बाइबल स्पष्ट रूप से ऐसी किसी बात का निषेध करती है, और कहती है, “चाहे खाओ, चाहे पीओ, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो।”

आपत्ति 4. “हर एक की प्रसन्नता विशेष रूप से उसी के अपने वश में रखी गई है; और यदि हर एक अपनी प्रसन्नता की खोज करे, तो सब की प्रसन्नता अधिक से अधिक सम्भव मात्रा में सुरक्षित हो जाएगी।”

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