व्याख्यान 245 (253 में से)

उसके राज्य के सामान्य सुख के प्रति उसके प्रेम के ही प्रयोग हैं। मनुष्य में भी ऐसा ही है। मनुष्य में जो कुछ भला है

यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

उसके राज्य के सामान्य सुख के प्रति उसके प्रेम के ही प्रयोग हैं। मनुष्य में भी ऐसा ही है। मनुष्य में जो कुछ भला है, वह प्रेम का ही कोई रूप है। पाप से घृणा केवल सद्गुण के प्रति प्रेम है, जो सद्गुण के विरोध में खड़ी हर बात का विरोध करने में अपने आप को प्रगट करता है। इसी प्रकार सच्चे विश्वास में प्रेम निहित और सम्मिलित है, और जिस विश्वास में प्रेम नहीं, या जो प्रेम के द्वारा कार्य नहीं करता, वह धर्म का कोई भाग नहीं है। धर्म से सम्बन्ध रखनेवाला विश्वास परमेश्वर पर स्नेहपूर्ण भरोसा है। परमेश्वर पर एक प्रकार का विश्वास ऐसा भी है, जिसमें कोई प्रेम नहीं। शैतान में उस प्रकार का विश्वास है। पाप का बोध पाए हुए पापी में वह होता है। परन्तु उसमें कोई धर्म नहीं। विश्वास यहाँ तक बढ़ सकता है कि आश्चर्यकर्मों का विश्वास बन जाए, फिर भी यदि उसमें प्रेम नहीं, तो वह कुछ भी नहीं। प्रेरित पौलुस 1 कुरिन्थियों के 13वें अध्याय में कहता है, “यदि मैं भविष्यद्वाणी कर सकूँ, और सब भेदों और सब प्रकार के ज्ञान को समझूँ, और मुझे यहाँ तक पूरा विश्वास हो, कि मैं पहाड़ों को हटा दूँ, परन्तु प्रेम न रखूँ, तो मैं कुछ भी नहीं।”

पश्चाताप के विषय में भी ठीक ऐसा ही है। जिस पश्चाताप में प्रेम सम्मिलित नहीं, वह “परमेश्वर की ओर मन फिराना” नहीं है। सच्चे पश्चाताप में प्रेम की व्यवस्था का पालन, और उसके फलस्वरूप पाप का विरोध निहित है।

III. मैं कुछ ऐसी बातों का उल्लेख करूँगा जो सिद्ध प्रेम के लिये आवश्यक नहीं हैं।

1. भावना की सबसे ऊँची मात्रा सिद्ध प्रेम के लिये आवश्यक नहीं है।

यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु मसीह में प्रेम की भावना की सबसे ऊँची मात्रा बहुत कम ही होती थी, फिर भी उसमें सदा सिद्ध प्रेम था। वह साधारणतः बहुत कम भावना या उत्तेजना प्रगट करता था। उत्तेजना सदा भावनाओं की प्रबलता के अनुपात में होती है, क्योंकि वह उन्हीं में निहित है। उद्धारकर्ता साधारणतः उल्लेखनीय रूप से शान्त दिखाई देता था। कभी-कभी उसका रोष प्रबल होता था, या मनुष्यों के मन की कठोरता पर उसका शोक; और कभी-कभी हम पढ़ते हैं कि वह आत्मा में आनन्दित हुआ। परन्तु वह प्रायः शान्त रहता था, और भावना की कोई ऊँची मात्रा प्रगट नहीं करता था। और यह स्पष्ट है कि सिद्ध प्रेम के लिये यह आवश्यक नहीं कि प्रेम की भावना ऊँची मात्रा में विद्यमान हो।

2. सिद्ध प्रेम, प्रेम में वृद्धि या अनुग्रह में बढ़ते जाने के विचार को वर्जित नहीं करता।

मैं समझता हूँ कि अनन्तकाल तक ज्ञान में मन की बढ़ती स्वभावतः अनन्तकाल तक प्रेम में बढ़ती को सूचित करती है। प्रभु यीशु मसीह अपने मानवीय स्वभाव में डील-डौल में, और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ता गया। निःसन्देह, बालक के रूप में वह ज्ञान में बढ़ा, और जैसे-जैसे वह ज्ञान में बढ़ा, वैसे-वैसे वह परमेश्वर के प्रति प्रेम में भी बढ़ा, और परमेश्वर के अनुग्रह में भी। जब वह बालक था तब उसका प्रेम सिद्ध था, परन्तु जब वह पुरुष हुआ तब वह और भी बड़ा था। एक मनुष्य के रूप में, सम्भवतः जब तक वह जीवित रहा, वह परमेश्वर के प्रति प्रेम में निरन्तर बढ़ता ही रहा। मन के स्वभाव से हम देखते हैं कि महिमा में सब पवित्र लोगों के साथ भी ऐसा ही हो सकता है, कि उनका प्रेम अनन्तकाल तक बढ़ता जाएगा, और फिर भी वह सदा सिद्ध प्रेम ही रहेगा।

3. सिद्ध प्रेम के लिये यह आवश्यक नहीं कि सब व्यक्तियों के प्रति सदा एक समान प्रेम का प्रयोग किया जाए।

हम सब व्यक्तियों के विषय में एक साथ नहीं सोच सकते। आप अपने परिचितों में से भी हर एक व्यक्ति के विषय में एक साथ नहीं सोच सकते। किसी व्यक्ति के प्रति प्रेम की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि वह व्यक्ति विचारों में उपस्थित है।

↑