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भलाई करने में लगा दें, तो वे सुखी हुए बिना रह ही नहीं सकते। यदि वे सुख को लक्ष्य के रूप में चुनते हैं, तो वह उनके आगे-आगे भागता है। सच्चा सुख सद्गुणी इच्छाओं की तृप्ति में है; और यदि वे परमेश्वर की महिमा करने और भलाई करने में लग जाएँ, तो वे उसे पा लेंगे। व्यक्तियों का केवल एक ही वर्ग है जो उसे कभी नहीं पाता, न इस संसार में, न आनेवाले संसार में, और वे वे लोग हैं जो उसे लक्ष्य बनाकर खोजते हैं।
II. मनुष्य के मन की और विश्व की बनावट परमेश्वर के प्रबन्ध का एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करती है।
मान लीजिए कि मनुष्य केवल अपने ही सुख का पीछा करके सुख पा सकता। तब हर व्यक्ति के पास केवल उतना ही सुख होता जितना उसने स्वयं प्राप्त किया होता, और विश्व का सारा सुख केवल उस सुख का कुल योग होता जो व्यक्तियों ने प्राप्त किया होता, और उसमें से परस्पर टकराते हितों से उत्पन्न सारी पीड़ा और दुर्दशा घटा दी जाती। अब ध्यान दीजिए! परमेश्वर ने वस्तुओं को ऐसा बनाया है कि जब हर एक दूसरों का सुख बढ़ाने में अपने आप को लगा देता है, तो उसका अपना सुख सुरक्षित और पूर्ण हो जाता है। तब विश्व में सुख की मात्रा कितनी अधिक बड़ी है, उसकी अपेक्षा जो वह होती यदि स्वार्थ यहोवा के राज्य का नियम होता। क्योंकि हर एक जो परमेश्वर की व्यवस्था को मानता है, अपने परोपकार के द्वारा अपना सुख पूरी तरह सुरक्षित कर लेता है, और सम्पूर्ण का सुख उतना ही बढ़ जाता है जितना हर एक अन्य सब से प्राप्त करता है।
बहुत से लोग कहते हैं, “यदि मैं अपने सुख की चिन्ता न करूँ, तो कौन करेगा? यदि मुझे केवल अपने पड़ोसी के हित की चिन्ता करनी है, और अपने हित की उपेक्षा करनी है, तो हम में से कोई भी सुखी न होगा।” यह बात सत्य होती, यदि आपके पड़ोसी के सुख के लिए आपकी चिन्ता आपके अपने सुख में से घटाई जाती। परन्तु यदि आपका सुख भलाई करने और दूसरों का सुख बढ़ाने में है, तो आप दूसरों के लिए जितना अधिक करेंगे, उतना ही अधिक आप अपना सुख बढ़ाएँगे।
III. जब मैंने इस व्याख्यान का विषय घोषित किया था, तब मैंने ‘स्वार्थ’ शब्द का प्रयोग करने से परहेज़ किया था, कहीं ऐसा न समझा जाए कि मैं किसी को चुभने वाली बात कह रहा हूँ। परन्तु अब मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि अपने ही हित को सर्वोपरि मानना स्वार्थ है, और कुछ नहीं। यदि परमेश्वर अपने हित को केवल इसलिए सर्वोपरि मानता कि वह उसका अपना है, तो यह परमेश्वर में भी स्वार्थ होता। और मनुष्य में यह स्वार्थ है। और जो कोई यह मानता है कि अपने ही हित को सर्वोपरि मानना सच्चा धर्म है, वह यह मानता है कि स्वार्थ सच्चा धर्म है।
IV. यदि स्वार्थ सद्गुण है, तो परोपकार पाप है। वे एक-दूसरे के सीधे विपरीत हैं और दोनों सद्गुण नहीं हो सकते। किसी मनुष्य का अपने हित को परमेश्वर के हित से ऊपर स्थापित करना, उसे प्राथमिकता देना, और उसे परमेश्वर के हित के विरोध में खड़ा करना, स्वार्थ है। और यदि यह सद्गुण है, तो यीशु
मसीह ने, मनुष्यजाति की भलाई को उस प्रकार खोजने में जैसा उसने खोजा, सद्गुण के सिद्धान्तों को त्याग दिया।
कौन ऐसा कहने का साहस करेगा?
V. जो लोग अपने ही हित को सर्वोपरि मानते हैं, और फिर भी सोचते हैं कि उनमें सच्चा धर्म है, वे धोखे में हैं। मैं यह गम्भीरता से कहता हूँ, क्योंकि मैं विश्वास करता हूँ कि यह सत्य है, और यदि यह न्याय के लिए जाने से पहले मेरा अन्तिम वचन भी होता, तो भी मैं यही कहता। प्रिय श्रोता, आप कोई भी हों, यदि आप ऐसा कर रहे हैं, तो आप मसीही नहीं हैं। इसे दोष लगाना मत कहिए। मैं दोष लगानेवाला नहीं हूँ।
मैं किसी की निन्दा नहीं करूँगा।
परन्तु जैसे परमेश्वर सच्चा है, और आपका प्राण न्याय के लिए जा रहा है, वैसे ही यह निश्चित है कि आपके पास बाइबल का धर्म नहीं है।
