व्याख्यान 25 (253 में से)

5. भूख की उन तृप्तियों का मामला लीजिए जो विवाद का विषय हैं, और

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5. भूख की उन तृप्तियों का मामला लीजिए जो विवाद का विषय हैं, और जिनका उचित होना, कम से कम कहें तो, सन्दिग्ध है।

(A.) दाखमधु, बियर और अन्य खमीरी नशीले पेयों को पीना। संयम-आन्दोलन की वर्तमान स्थिति में, क्या यह कम से कम सन्दिग्ध नहीं है कि इन पेयों का उपयोग करना प्रेरित के दिए हुए इस नियम का उल्लंघन तो नहीं है, “भला तो यह है, कि तू न मांस खाए, और न दाखरस पीए, न और कुछ ऐसा करे, जिस से तेरा भाई ठोकर खाए, या ठेस पाए, या निर्बल हो।” कोई भी मनुष्य मुझे यह विश्वास नहीं दिला सकता कि उसे ऐसा करने के उचित होने पर कोई सन्देह नहीं है।

इसके उचित होने का कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, और इसके अनुचित होने का दृढ़ प्रमाण है, और हर वह मनुष्य जो इसके उचित होने पर सन्देह करते हुए भी इसे करता है, दोषी ठहरता है, और यदि वह इसमें लगा रहता है, तो दण्ड पाता है।

यदि इस सब में कोई कुतर्क है, तो मैं उसे जानना चाहूँगा, क्योंकि मैं न तो दूसरों को धोखा देना चाहता हूँ और न स्वयं धोखा खाना चाहता हूँ। परन्तु यदि यह मूल वचन के भाव से निकलनेवाला एक सरल, सीधा और अनिवार्य निष्कर्ष नहीं है, तो मैं पूरी तरह धोखे में हूँ।

(B.) तम्बाकू। क्या कोई मनुष्य यह दिखावा कर सकता है कि उसे इस बात में कोई सन्देह नहीं कि तम्बाकू का उपयोग करना उसके लिए परमेश्वर की इच्छा के अनुकूल है? कोई भी मनुष्य यह दिखावा नहीं कर सकता कि उसे इन वस्तुओं को

छोड़ देने के उचित होने पर सन्देह है। क्या कोई भी जीवित मनुष्य यह सोचता है कि वह विलासिता के रूप में दाखमधु, या तेज़ बियर, या तम्बाकू का उपयोग करने के लिए कर्तव्य से बँधा है? नहीं। सन्देह पूरी तरह एक ही ओर है। तो फिर हम उस मनुष्य के विषय में क्या कहें, जो इसके उचित होने पर सन्देह करता है, और फिर भी अपना मुँह उस विषैली पत्ती से भरता रहता है? वह दोषी ठहरता है।

(C.) मैं चाय और कॉफ़ी का भी उल्लेख कर सकता हूँ। यह सामान्य रूप से ज्ञात है कि ये वस्तुएँ बिलकुल भी पौष्टिक नहीं हैं, और इस देश में हर वर्ष इन पर लगभग 80 लाख डॉलर खर्च किए जाते हैं। अब, क्या कोई मनुष्य यह दिखावा करेगा कि उसे इतना सारा धन ऐसी वस्तु पर खर्च करने के उचित होने पर सन्देह नहीं है जो किसी काम की नहीं, और जिसके विषय में वे सब लोग, जिन्होंने इस विषय की जाँच की है, भली-भाँति जानते हैं कि वह सीधे-सीधे हानिकारक है, निर्बल पेटों के लिए असहनीय है, और सबसे बलवान पेट भी उसे बड़ी कठिनाई से ही पचा पाते हैं? और यह सब उस समय, जब इस युग की विभिन्न परोपकारी संस्थाएँ विदेशों में सुसमाचार भेजने और एक संसार को नरक से बचाने के लिए ऊँचे स्वर से सहायता की पुकार कर रही हैं? यह सोचिए कि अकेली कलीसिया ही अपनी चाय की मेज़ों पर लाखों डॉलर खर्च कर देती है—क्या यहाँ कोई सन्देह नहीं है?

6. इस सिद्धान्त को विभिन्न मनोरंजनों पर लागू कीजिए।

(A.) नाट्यशाला (थिएटर)। धर्म का अंगीकार करनेवालों की बहुत बड़ी भीड़ थिएटर जाती है। और वे तर्क देते हैं कि बाइबल कहीं भी इसे मना नहीं करती। अब ध्यान दीजिए। मसीही होने का अंगीकार करनेवाला ऐसा कौन है जो कभी थिएटर गया हो और उसे यह सन्देह न हुआ हो कि जो वह कर रहा है वह उचित है या नहीं?

मैं यह कदापि नहीं मानता कि यह केवल सन्देह की बात है। मैं समझता हूँ कि यह एक बहुत स्पष्ट मामला है, और यह दिखाया जा सकता है, कि यह अनुचित है। परन्तु अभी मैं केवल आप में से उन लोगों का सामना कर रहा हूँ, यदि यहाँ कोई ऐसे हैं, जो थिएटर जाते हैं, और इस आड़ में अपने आप को छिपाने का प्रयत्न कर रहे हैं कि बाइबल कहीं भी स्पष्ट रूप से इसे मना नहीं करती।

(B.) आमोद-प्रमोद की दावतें, जहाँ लोग जाकर ठूँस-ठूँसकर खाते-पीते हैं। क्या यह सन्देह करने का कोई कारण नहीं कि यह समय और धन का ऐसा उपयोग है या नहीं जैसा परमेश्वर चाहता है? भूखों मरते गरीबों को देखिए, और इस रंगरेलियों और फ़िज़ूलखर्ची के प्रभाव पर विचार कीजिए, और देखिए कि क्या आप फिर कभी

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