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पड़ोसी के विरुद्ध बेलगाम जीभ से बोलने की, और अपने पड़ोसी को हानि पहुँचाने की छूट देता है, वह, यदि सोचता है कि वह अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखता है, तो अपने आप को धोखा देता है। विचित्र प्रेम!
II. मन में धर्म के विषय में बहुत प्रकाश हो सकता है, फिर भी प्रेम न हो।
आप प्रायः ऐसे व्यक्तियों को देखते हैं जो धर्म के विषय में बौद्धिक रूप से बहुत कुछ समझते हैं, और उसे दूसरों के सामने खोलकर रख सकते हैं, जबकि यह स्पष्ट होता है कि वे प्रेम की आत्मा से प्रेरित नहीं हैं। उनके होठों पर कृपा की व्यवस्था नहीं है।
III. जिन व्यक्तियों में बहुत धार्मिक ज्ञान और जोश है, परन्तु प्रेम नहीं, वे अत्यन्त अप्रिय और खतरनाक लोग होते हैं।
वे सदा दोष लगानेवाले, घमण्डी, ढीठ, और अभिमानी होते हैं। वे गहरी छाप छोड़ सकते हैं, परन्तु सच्चा धर्म उत्पन्न नहीं करते। वे बड़े जोश से आपको अपनी ओर करना चाहते हैं, परन्तु भली मनसा से नहीं।
IV. किसी मनुष्य के जोश की दिशा उसके धर्म के चरित्र को निर्धारित करेगी।
इससे प्रगट होगा कि उसके मन के प्रकाश के साथ प्रेम है या नहीं। यदि है, तो उसका जोश सम्प्रदायवादी स्वभाव का न होगा। मुझे ऐसा मनुष्य दिखाइए जो उन सब के प्रति ईर्ष्या से भरा है जो उसके सम्प्रदाय या दल के नहीं, और वह मनुष्य सिद्ध प्रेम से बहुत दूर है।
सच्चा प्रेम कभी निन्दा करनेवाला या कठोर नहीं होता। यदि उसे दूसरों के दोषों की चर्चा करने का अवसर मिले, तो वह यह कृपा के साथ और दुःख के साथ करता है। सिद्ध प्रेम न दूसरों से, न दूसरों के विषय में, रूखे या अपमानजनक ढंग से बोल सकता है। वह धर्म की केवल ऊपरी बातों पर बहुत बल न देगा, और न विशेष तरीकों या रीतियों के लिये हठ करेगा। बहुत से लोग कुछ बातों के पक्ष या विपक्ष में उग्रता से विवाद करेंगे, जैसे नए तरीकों के पक्ष या विपक्ष में; परन्तु यदि वे प्रेम से भरे होते तो ऐसा न करते। जो जोश सिद्ध प्रेम से संचालित होता है, वह धर्म के किन्हीं रूपों के पक्ष या विपक्ष में विवाद करने में अपने आप को खर्च न करेगा, और न छोटी-छोटी भूलों और बुराइयों पर आक्रमण करेगा। प्रेम धर्म की मूल बातों पर बल देने की ओर ले जाता है। वह उत्साही हृदयवाले मसीहियों से लिपटा रहता है, चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय के क्यों न हों, और उनसे प्रेम रखता है, और उनकी संगति में आनन्दित होता है।
यह जोश कभी विवादी, या वाद-विवाद से भरा नहीं होता। ऐसे मनुष्य को खोजिए जिसे कलीसियाई सभाओं में जाना प्रिय है, और जो उस समय के सब झगड़ों में कूद पड़ता है, और वह मनुष्य प्रेम से भरा नहीं है। पवित्र प्रेम से भरे मन के लिये ऐसी सभाओं में जाना, और पादरियों को दलों में बँटते, और चालें चलते, और गुटबन्दी करते, और छोटी-छोटी बातों पर वकीली दाँव-पेंच लड़ाते, और प्रभुता के लिये संघर्ष करते देखना अत्यन्त कष्टदायक होता है। ऐसे व्यक्ति को खोजिए जिसे समाचारपत्रों में वाद-विवाद प्रिय है, वह प्रेम से भरा नहीं है। यदि होता, तो वह अपना बचाव करने या उत्तर देने के लिये मुड़ने की अपेक्षा, चाहे आमने-सामने या समाचारपत्रों के द्वारा, अपमानित, और निन्दित, और कलंकित होना अधिक पसन्द करता। वह कभी गाली के बदले गाली न देता, पर इसके विपरीत आशीष ही देता। और जहाँ तक हो सके, वह सब मनुष्यों के साथ मेल-मिलाप से रहता।
V. जिसे धर्म कहा जाता है उसमें से कितने में प्रेम नहीं है।
जो कुछ धर्म के कामों के रूप में माना जाता है, उसमें से कितना कुछ बाहरी कारणों और प्रभावों से विवश होकर किया जाता है, न कि प्रेम की भीतरी शक्ति से। यह बात जितनी समझी जाती है, उससे अधिक अच्छी तरह समझी जानी चाहिए, कि जब तक प्रेम ही मुख्य प्रेरक शक्ति न हो, तब तक बाहरी काम चाहे कुछ भी हो, चाहे प्रार्थना करना, स्तुति करना, दान देना, या और कुछ, उसमें कोई धर्म नहीं है।
