व्याख्यान 192 (253 में से)

(2.) चाहे उसने अपने विषय में कहा हो, या किसी और व्यक्ति के विषय में, या केवल एक स्थिति की कल्पना की हो

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(2.) चाहे उसने अपने विषय में कहा हो, या किसी और व्यक्ति के विषय में, या केवल उदाहरण के लिए एक स्थिति की कल्पना की हो, इस प्रश्न के लिए यह बात पूर्णतः महत्वहीन है।

(3.) यह स्पष्ट है कि जिस बात को वह उदाहरण द्वारा समझाना चाहता था, वह यह थी कि शारीरिक मन पर व्यवस्था के प्रभाव के सम्बन्ध में परमेश्वर की व्यवस्था का पक्ष-समर्थन किया जाए।

(4.) उदाहरण के रूप में इस बात के लिए आवश्यकता थी एक ऐसे पापी के उदाहरण की जिसे पाप का बोध हुआ हो, जिसने व्यवस्था की उत्तमता को देखा हो, परन्तु जिसमें वासनाओं का प्रभुत्व हो।

(5.) यदि यह मसीही अनुभव के विषय में कहा गया है, तो यह न केवल असंगत है, वरन् उस बात के विपरीत सिद्ध करता है जो वह कहना चाहता था। वह यह दिखाना चाहता था कि व्यवस्था यद्यपि भली है, तौभी वह वासना की शक्ति को नहीं तोड़ेगी। परन्तु यदि यह मसीही अनुभव है, तो इससे यह सिद्ध होता है कि व्यवस्था के बदले सुसमाचार वासना को वश में नहीं कर सकता और मनुष्यों को पवित्र नहीं कर सकता।

(6.) सातवें अध्याय में वर्णित दशा और आठवें अध्याय में वर्णित दशा के बीच का अन्तर यह सिद्ध करता है कि पहले वाले का अनुभव एक मसीही का अनुभव नहीं था।

I. जो लोग अपना अनुभव रोमियों के ग्यारहवें अध्याय में लिखा हुआ पाते हैं, वे मन-परिवर्तित लोग नहीं हैं। यदि उनका अभ्यस्त चरित्र यही है, तो उनका नया जन्म नहीं हुआ है; वे पाप के बोध में हैं, परन्तु मसीही नहीं हैं।

II. आप देखते हैं कि पापियों के साथ व्यवहार करने में व्यवस्था का प्रयोग करना कितना अत्यन्त महत्वपूर्ण है, ताकि वे सुसमाचार का मूल्य समझें, और परमेश्वर को धर्मी ठहराएँ और स्वयं को दोषी ठहराएँ। पापी सच्चा पश्चाताप कभी नहीं करते, जब तक कि व्यवस्था के द्वारा उन्हें पाप का बोध न हो।

III. साथ ही, आप देखते हैं कि मनुष्यों का मन-परिवर्तन करने के लिए व्यवस्था पूर्णतः अपर्याप्त है। इस विषय में व्यवस्था की सबसे ऊँची प्रभावशीलता का उदाहरण शैतान की दशा में मिलता है।

IV. आप केवल इच्छाओं को भक्ति समझ बैठने का खतरा देखते हैं। जो इच्छा सही चुनाव में परिणत नहीं होती, उसमें कुछ भी भला नहीं है। ऐसी इच्छाएँ तो शैतान में भी हो सकती हैं।

पृथ्वी के सबसे दुष्ट मनुष्य भी धर्म की इच्छा कर सकते हैं, और निःसन्देह प्रायः करते भी हैं, जब वे देखते हैं कि यह उनके उद्धार के लिए, या उनकी वासनाओं को वश में करने के लिए आवश्यक है।

V. केवल मसीह और सुसमाचार ही वे प्रेरक कारण प्रस्तुत करते हैं जो मन को पवित्र कर सकते हैं। व्यवस्था तो केवल दोष का बोध कराती और दण्ड की आज्ञा देती है।

VI. जिनका सचमुच मन-परिवर्तन हुआ है और जो सुसमाचार की स्वतंत्रता में लाए गए हैं, वे अपनी भ्रष्टताओं के बन्धन से छुटकारा अवश्य पाते हैं।

वे अवश्य पाते हैं कि मन पर देह की शक्ति टूट गई है। उनके संघर्ष और परीक्षाएँ हो सकती हैं, बहुत सी और कठिन; परन्तु अभ्यस्त रूप से, वे वासना की दासता से छुड़ाए जाते हैं, और पाप पर विजय पाते हैं, और परमेश्वर की सेवा करना सहज पाते हैं। उसकी आज्ञाएँ उनके लिए कठिन नहीं हैं। उसका जूआ सहज और उसका बोझ हल्का है।

VII. सच्चा नया विश्वासी परमेश्वर के साथ मेल पाता है। वह अनुभव करता है कि यह उसके पास है। वह उसका आनन्द लेता है। उसे क्षमा किए गए पाप का, और भ्रष्टता पर विजय का बोध होता है।

VIII. इस विषय से आप कलीसिया के बहुत से सदस्यों की सच्ची स्थिति देखते हैं। वे निरन्तर व्यवस्था के अधीन संघर्ष कर रहे हैं। वे व्यवस्था का अनुमोदन करते हैं, उसकी आज्ञा का भी और उसके दण्ड का भी; वे अपने को दोषी अनुभव करते हैं, और छुटकारे की इच्छा रखते हैं। परन्तु फिर भी वे दुःखी हैं। उनके पास न

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