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या दोनों पक्षों की सापेक्ष परिस्थितियाँ, इस कर्तव्य के दायित्व को दूर नहीं करतीं। सम्बन्ध चाहे जो भी हो, आपको पाप को डाँटना है, और प्रभु के नाम से ऐसा करने के लिए आप बाध्य हैं। इसे ऐसे न कीजिए मानो आप अपने विरुद्ध की गई किसी निजी हानि के लिए शिकायत कर रहे हों या दोष निकाल रहे हों, बल्कि परमेश्वर के विरुद्ध किए गए पाप के रूप में। इस प्रकार, जब कोई बालक अपने माता-पिता को पाप के लिए डाँटता है, तो उसे ऐसे नहीं करना है मानो वह अपने प्रति की गई किसी हानि के लिए उनसे शिकायत कर रहा हो, बल्कि इस बात पर दृष्टि रखते हुए कि माता-पिता ने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है, और इसलिए, उस सारी स्पष्टता, और विश्वासयोग्यता, और तीक्ष्णता के साथ जिसकी पाप माँग करता है।
(2.) ताड़ना उस ज्ञान के अनुसार नियमित की जानी चाहिए जो अपराधी को अपने कर्तव्य का है।
यदि व्यक्ति अज्ञानी है, तो ताड़ना कठोर डाँट के रूप में होने के बजाय अधिकतर शिक्षा के रूप में होनी चाहिए। आप अपने छोटे बच्चे के साथ क्या करते हैं? आप उसे शिक्षा देते हैं और उसके कर्तव्य के विषय में उसके मन को ज्योति देने का यत्न करते हैं। स्वाभाविक है कि आप उस रीति से बहुत भिन्न रीति अपनाते हैं जो आप किसी कठोर हृदय अपराधी के साथ अपनाते।
(3.) अपराध कितनी बार किया गया है, इसका भी ध्यान रखते हुए।
आप पहले अपराध को उस रीति से बहुत भिन्न रीति से डाँटेंगे जो आप किसी आदतन अपराधी के प्रति अपनाते। यदि कोई व्यक्ति पाप करने का आदी है, और जानता है कि यह गलत है, तो आप अधिक कठोरता बरतते हैं। यदि यह पहली बार है, तो कदाचित उसकी ओर केवल एक संकेत ही उसकी पुनरावृत्ति को रोकने के लिए पर्याप्त हो।
(4.) उसी प्रकार, आपको यह भी विचार करना है कि क्या उसे उस पाप के लिए बार-बार डाँटा गया है।
यदि उसने न केवल बार-बार पाप किया है, बल्कि बार-बार डाँटा भी गया है, और फिर भी उसने हठ किया है, तो तीखापन बरतने की और भी अधिक आवश्यकता है। पहले की ताड़नाओं का विरोध करने से जो कठोरता आई है, वह दिखाती है कि कोई साधारण समझाना-बुझाना उस पर असर नहीं करेगा। आवश्यक है कि प्रभु के भय की बातें ओलों की आँधी के समान उस पर बरसाई जाएँ।
4. सदा यह दिखाइए कि आपका मिज़ाज बिगड़ा नहीं है।
अपराधी के प्रति कभी ऐसी अप्रसन्नता प्रकट न कीजिए जिसे वह किसी भी प्रकार अपने प्रति निजी अप्रसन्नता समझ सके। बहुधा यह महत्वपूर्ण होता है कि जो वह कर रहा है उसके प्रति आप अपनी प्रबल अप्रसन्नता प्रकट करें। अन्यथा वह सोचेगा कि आप गम्भीर नहीं हैं। मान लीजिए आप किसी मनुष्य को हत्या के लिए ऐसी रीति से डाँटें जिसमें उसके अपराध के प्रति कोई घृणा प्रकट न हो, तो आप कोई प्रभाव उत्पन्न होने की आशा नहीं करेंगे। रीति अपराध के स्वभाव के अनुकूल होनी चाहिए, फिर भी ऐसी कि वह यह न सोचे कि आपके मन में कोई निजी भावना है। मंच (पल्पिट) पर और उसके बाहर भी, अपराध को डाँटने की रीति में यही सबसे बड़ी कमी है। अप्रसन्न करने के डर से, मनुष्य पाप के प्रति अपनी घृणा प्रकट नहीं करते, और इसी कारण अपराधी इतने कम लौटाए जाते हैं।
5. सदा परमेश्वर के आत्मा में होकर डाँटिए।
आपमें सदा पवित्र आत्मा इतनी मात्रा में होना चाहिए, कि जब आप किसी मनुष्य को पाप के लिए डाँटें, तो उसे ऐसा लगे मानो यह परमेश्वर की ओर से आया है। मैं ऐसे उदाहरण जानता हूँ, जहाँ उस दशा में रहनेवाले किसी मसीही की ताड़ना ने अपराधी के हृदय को छेद दिया, और सर्वशक्तिमान के तीर के समान डंक मारा, और जब तक उसने पश्चाताप न किया वह उससे छुटकारा न पा सका।
6. ताड़ना देने की कई भिन्न-भिन्न रीतियाँ हैं जिनसे डाँटे जानेवाले व्यक्ति तक पहुँचा जा सके।
