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अध्याय 2: झूठे अंगीकार करनेवाले।
टिप्पणियाँ 1. देखिए कि संसार में यीशु मसीह के लिए इतना कम काम क्यों पूरा होता है।
इसका कारण यह है कि उसके लिए कुछ भी करनेवाले बहुत थोड़े हैं। इसका कारण यह है कि संसार में यीशु मसीह के सच्चे सेवक बहुत थोड़े हैं। आपके विचार में इस कलीसिया में, या आपके सारे जान-पहचानवालों में, धर्म का अंगीकार करनेवाले कितने ऐसे हैं जो सचमुच परमेश्वर के लिए काम में लगे हैं, और धर्म को ही अपना कारोबार बनाए हुए हैं, और मसीह के राज्य को आगे बढ़ाने में अपने आप को पूरी तरह लगा रहे हैं? धर्म के इससे अधिक तेज़ी से आगे न बढ़ने का कारण यह है कि उसे आगे बढ़ानेवाले इतने थोड़े हैं, और उसमें बाधा डालनेवाले इतने अधिक। आप आग लगने पर लोगों का एक झुंड देखते हैं, जो किसी दुकान से माल बाहर निकालने का प्रयत्न कर रहा है।
कुछ लोग माल बाहर निकालने के लिए दृढ़ हैं, परन्तु बाकी लोग उसमें लगे नहीं हैं, और वे दूसरी बातों की चर्चा करके उनका ध्यान बँटाते हैं, या उनके काम करने के ढंग में दोष निकालकर, या उन्हें पीछे रोककर, सीधे-सीधे उनके काम में बाधा डालते हैं। कलीसिया में भी ऐसा ही है। जो लोग काम करने के इच्छुक हैं, वे बाकी लोगों की सुस्ती, उनके कुतर्कों और उनके खुले विरोध के कारण बहुत बाधा पाते हैं।
2. देखिए कि इतने थोड़े मसीहियों में प्रार्थना की आत्मा क्यों होती है। उनमें प्रार्थना की आत्मा कैसे हो सकती है? परमेश्वर उन्हें प्रार्थना की आत्मा किस लिए दे?
मान लीजिए कि कोई मनुष्य अपनी सांसारिक योजनाओं में लगा हुआ है, और परमेश्वर उस मनुष्य को प्रार्थना की आत्मा दे दे। निश्चय ही वह उसी बात के लिए प्रार्थना करेगा जो उसके हृदय के सबसे निकट है; अर्थात् अपनी सांसारिक योजनाओं में सफलता के लिए, ताकि उसके द्वारा अपने ही देवताओं की सेवा करे। क्या परमेश्वर ऐसे उद्देश्य के लिए उसे प्रार्थना की आत्मा देगा? कभी नहीं। वह प्रार्थना की आत्मा के लिए अपने ही देवताओं के पास जाए, परन्तु जब तक वह अपने ही देवताओं की सेवा कर रहा है, तब तक यह आशा न रखे कि यहोवा उसे प्रार्थना की आत्मा प्रदान करेगा।
3. आप देखते हैं कि धर्म का अंगीकार करनेवालों की एक बड़ी भीड़ है जिन्होंने अभी तक धार्मिक होना आरम्भ भी नहीं किया है।
एक व्यक्ति ने उनमें से एक से कहा, क्या आप यह अनुभव करते हैं कि आपकी संपत्ति और आपका कारोबार सब परमेश्वर का है, और क्या आप उन्हें परमेश्वर के लिए रखते और चलाते हैं? उसने कहा, “ओह, नहीं, मैं अभी इतना आगे नहीं पहुँचा हूँ।” इतना आगे नहीं पहुँचा! वह व्यक्ति वर्षों से धर्म का अंगीकार करनेवाला था, और फिर भी इतना आगे नहीं पहुँचा था कि अपनी संपत्ति, अपने कारोबार और अपने सब कुछ को परमेश्वर का समझे! निःसन्देह वह अपने ही देवताओं की सेवा कर रहा था। क्योंकि मैं इस बात पर ज़ोर देता हूँ कि यही धर्म का बिलकुल आरम्भ है। मन-परिवर्तन इसके सिवा और क्या है कि मनुष्य संसार की सेवा से फिरकर परमेश्वर की सेवा की ओर मुड़े? और फिर भी इस व्यक्ति को अब तक यह पता नहीं चला था कि वह परमेश्वर का सेवक है। और उसे ऐसा लगता था कि यह अनुभव करना कि उसका सब कुछ प्रभु का है, धर्म में बहुत आगे पहुँच जाना है।
4. लोगों के लिए यह बड़ी बेईमानी है कि वे प्रभु की सेवा करने का अंगीकार करें, और फिर भी वास्तव में अपनी ही सेवा करें।
आप जो स्वार्थी उद्देश्यों से धार्मिक कर्तव्य निभा रहे हैं, वास्तव में परमेश्वर को अपना सेवक बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यदि आपका अपना हित ही सर्वोच्च लक्ष्य है, तो आपकी सारी धार्मिक सेवाएँ केवल इस इच्छा से की जाती हैं कि परमेश्वर को आपके हितों को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जाए। आप प्रार्थना क्यों करते हैं, या
