व्याख्यान 200 (253 में से)

अभिप्रेत आशीष क्या थी। वह पवित्रता थी। इसी प्रकार प्रेरित एक अन्य स्थान पर हमें बताता है कि यीशु मसीह

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अभिप्रेत आशीष क्या थी। वह पवित्रता थी। इसी प्रकार प्रेरित एक अन्य स्थान पर हमें बताता है कि यीशु मसीह इसलिए दिया गया कि वह अपने लिए एक निज प्रजा पवित्र करे।

मूसा की विधि के सब शुद्धीकरण और अन्य रीतियाँ भी उसी बात को सूचित करती थीं; क्योंकि वे सब आनेवाले उद्धारकर्ता की ओर संकेत करती थीं। देह को शुद्ध करने की वे विधियाँ, उनमें से हर एक, मन के शुद्ध होने, अर्थात् पवित्रता, के सन्दर्भ में ठहराई गई थीं।

सुसमाचार के अधीन, यही बात बपतिस्मे के द्वारा सूचित की जाती है; देह का धोया जाना मन के पवित्रीकरण को दर्शाता है।

यहेजकेल 36:25 में यह आशीष सुसमाचार की बड़ी आशीष के रूप में स्पष्ट रूप से प्रतिज्ञा की गई है:

“मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतों से शुद्ध करूँगा। मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूँगा। और मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूँगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे और मेरे नियमों को मानकर उनके अनुसार करोगे।”

ऐसा ही यिर्मयाह 33:8 में है: “और मैं उनको उनके सारे अधर्म के काम से शुद्ध करूँगा जो उन्होंने मेरे विरुद्ध किए हैं; और उन्होंने जितने अधर्म और अपराध के काम मेरे विरुद्ध किए हैं, उन सब को मैं क्षमा करूँगा।” परन्तु पुराने नियम की भविष्यद्वाणियों के वे सब खण्ड उद्धृत करने में बहुत अधिक समय लगेगा जो पवित्रता को वाचा की बड़ी आशीष के रूप में प्रस्तुत करते हैं। मैं चाहता हूँ कि आप सब अपने लिए स्वयं बाइबल में खोजें, और आप यह पाकर चकित होंगे कि पवित्रीकरण की आशीष को कितनी एकरूपता से उस मुख्य आशीष के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसकी प्रतिज्ञा मसीहा के द्वारा संसार से की गई है।

अरे, कौन सन्देह कर सकता है कि मसीहा के आने का बड़ा उद्देश्य अपने लोगों को पवित्र करना था? पतन के तुरन्त बाद यह भविष्यद्वाणी की गई थी कि शैतान उसकी एड़ी को डसेगा, परन्तु वह शैतान के सिर को कुचल डालेगा। और प्रेरित यूहन्ना हमें बताता है कि “परमेश्वर का पुत्र इसलिये प्रगट हुआ, कि शैतान के कामों को नाश करे।” उसने शैतान को अपने पाँवों तले करने का बीड़ा उठाया है। उसका उद्देश्य है हमें परमेश्वर के प्रति हमारी स्वामिभक्ति में वापस जीत लाना, हमें पवित्र करना, हमारे मनों को शुद्ध करना। जैसा जकर्याह 13:1 में कहा गया है, “उसी दिन दाऊद के घराने और यरूशलेम के निवासियों के लिये पाप और मलिनता धोने के निमित्त एक सोता फूटेगा।”

और दानिय्येल कहता है, “तेरे लोगों और तेरे पवित्र नगर के लिये सत्तर सप्ताह ठहराए गए हैं कि अपराध का होना बन्द हो, और पापों का अन्त और अधर्म का प्रायश्चित किया जाए, और युगयुग की धार्मिकता प्रगट हो; और दर्शन की बात पर और भविष्यद्वाणी पर छाप दी जाए, और परमपवित्र का अभिषेक किया जाए।” परन्तु इन वचनों की भीड़ को गिनाना व्यर्थ है। पुराना

नियम इससे भरा पड़ा है।

नये नियम में, उद्धारकर्ता का जो पहला वृत्तान्त हमें मिलता है, वह हमें बताता है कि उसका नाम “यीशु” रखा गया, “क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा।” इसी प्रकार कहा गया है, “वह इसलिये प्रगट हुआ, कि पापों को हर ले जाए,” और “कि शैतान के कामों को नाश करे।” तीतुस 2:13 में प्रेरित पौलुस परमेश्वर के अनुग्रह, अर्थात् सुसमाचार, के विषय में कहता है कि वह हमें अभक्ति से मन फेरना सिखाता है।

“और उस धन्य आशा की अर्थात् अपने महान परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की महिमा के प्रगट होने की बाट जोहते रहें। जिस ने अपने आप को हमारे लिये दे दिया, कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और

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