व्याख्यान 206 (253 में से)

कलीसिया अपनी वर्तमान दशा में उन्हें देखे। मेरा विश्वास है कि यदि सब कुछ प्रकाश में आ सके, तो यह

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कलीसिया अपनी वर्तमान दशा में उन्हें देखे। मेरा विश्वास है कि यदि सब कुछ प्रकाश में आ सके, तो यह दिखाई देगा कि वे इस सिद्धान्त में दृढ़ विश्वास रखते थे। कलीसिया को इन पुस्तकों को पढ़ना और इन पर गहराई से मनन करना चाहिए।

इस समय मेरे मन में एक ऐसा व्यक्ति है जो कलीसिया का सदस्य तो था, परन्तु बहुत सांसारिक था; और जब जागृति आई तो पहले उसने उसका विरोध किया; परन्तु बाद में वह जाग उठा, और एक भयानक संघर्ष के बाद वह टूट गया, और तब से वह अत्यन्त समर्पित भक्ति का जीवन बिता रहा है, और अपने धन्य स्वामी के समान परमेश्वर के राज्य को बढ़ाने के लिए निरन्तर परिश्रम और प्रार्थना करता रहता है।

मैंने इस मनुष्य को कभी यह कहते नहीं सुना कि वह अपने को सिद्ध समझता है, परन्तु मैंने उसे बहुधा पूर्णतः पवित्र किए जाने के कर्तव्य और उसकी व्यावहारिकता के विषय में बोलते सुना है। और यदि संसार में कोई मनुष्य ऐसा है, तो मेरा विश्वास है कि वह उनमें से एक है।

इस विषय पर लोगों की धारणाएँ बड़ी विचित्र हैं। कभी-कभी आप उन्हें इस आधार पर मसीही सिद्धता के विरुद्ध तर्क करते सुनेंगे कि जो मनुष्य पूर्णतः पवित्र हो, वह जीवित नहीं रह सकता, इस संसार में उसका अस्तित्व बना ही नहीं रह सकता। मेरा विचार है कि बीते समय में मैंने स्वयं भी ठीक ऐसी ही बातें की हैं। मैं जानता हूँ कि

मैंने इस विषय पर मूर्ख के समान बातें की हैं। अरे, जो पवित्र जन सिद्ध हो, वह तो अपने संगी मनुष्यों की भलाई के प्रति पहले से कहीं अधिक सजीव होगा। क्या यीशु मसीह पृथ्वी पर जीवित नहीं रह सका? वह तो पूर्णतः पवित्र था। लोग सोचते हैं कि यदि कोई व्यक्ति पूर्णतः पवित्र किया गया हो, और परमेश्वर से सिद्ध प्रेम रखता हो, तो वह ऐसी उत्तेजना की दशा में होगा कि वह देह में बना ही नहीं रह सकेगा, न खा सकेगा न सो सकेगा, और न जीवन के साधारण कर्तव्यों पर ध्यान दे सकेगा। परन्तु इसका कोई प्रमाण नहीं है। प्रभु

यीशु मसीह एक मनुष्य था, जो अन्य मनुष्यों की सब परीक्षाओं के अधीन था; वह प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन और सारे प्राण और सारी शक्ति से प्रेम भी रखता था। फिर भी ऐसा नहीं दिखता कि वह ऐसी उत्तेजना की दशा में था कि वह न खा सकता था न सो सकता था, न बढ़ई के रूप में अपना काम कर सकता था, और न देह का पूर्ण स्वास्थ्य और मन की पूर्ण शान्ति बनाए रख सकता था। तो फिर जो पवित्र जन पूर्णतः पवित्र किया गया है, उसके लिए यीशु मसीह की अपेक्षा कुछ अधिक यह क्यों आवश्यक हो कि वह अनियंत्रित उत्तेजना में बह जाए, या तीव्र भावावेग से मर जाए? इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, और मसीही सिद्धता में ऐसी कोई बात निहित नहीं है।

टिप्पणियाँ अब हम वे कारण देख सकते हैं जिनसे संसार में अधिक सिद्धता नहीं पाई जाती।

1. मसीही यह विश्वास नहीं करते कि यह परमेश्वर की इच्छा है, या कि परमेश्वर चाहता है कि वे इस संसार में पूर्णतः पवित्र किए जाएँ।

वे जानते हैं कि वह उन्हें आज्ञा देता है कि वे सिद्ध बनें जैसा वह सिद्ध है, परन्तु वे सोचते हैं कि भीतर ही भीतर वह ऐसा नहीं चाहता, और वास्तव में यह इच्छा नहीं रखता कि वे ऐसे हों। वे कहते हैं, “नहीं तो वह हमें सिद्ध बनाने के लिए हमारे लिए और अधिक क्यों नहीं करता?” निःसन्देह परमेश्वर उन्हें अन्यथा बनाने के लिए किन्हीं और साधनों या प्रभावों की किसी और व्यवस्था का प्रयोग करने की अपेक्षा उनका वैसे ही बने रहना अधिक उचित समझता है जैसे वे हैं; क्योंकि वह देखता है कि साधनों की एक नई व्यवस्था लागू करना उन्हें वैसे ही रहने देने से कहीं बड़ी बुराई होगी। जहाँ दो बुराइयों में से एक अनिवार्य हो, वहाँ वह उन दोनों में से छोटी बुराई को चुनता है; और कौन सन्देह करता है कि जिन परिस्थितियों में वे हैं, उनमें वह उनके पाप करते रहने की अपेक्षा उनका सिद्ध होना अधिक चाहता है? पापी ठीक वैसे ही तर्क करते हैं जैसे ये अंगीकार करनेवाले तर्क करते हैं। वे कहते हैं, “मैं विश्वास नहीं करता कि वह मेरा पश्चाताप चाहता है; यदि चाहता, तो वह मुझसे पश्चाताप करवा देता।” हे पापी,

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