व्याख्यान 233 (253 में से)

वे उनके विद्रोही हृदयों को वश में कर लें और उन्हें स्वेच्छा से परमेश्वर की आज्ञा मानने की ओर ले आएँ। यह प्रभावकारी

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वे उनके विद्रोही हृदयों को वश में कर लें और उन्हें स्वेच्छा से परमेश्वर की आज्ञा मानने की ओर ले आएँ। यह प्रभावकारी ज्ञान है। यह मनुष्यों के पास परमेश्वर के आत्मा के बिना न कभी होता है, और न कभी हो सकता है।

यदि मनुष्य सही करने की ओर झुके होते, तो मैं नहीं जानता कि बिना सहायता की बुद्धि के द्वारा प्राप्त होने योग्य उनका ज्ञान कहाँ तक प्रभावकारी हो सकता। परन्तु, क्योंकि वे सार्वभौमिक रूप से और पूरी तरह इसकी ओर झुके नहीं हैं, यह ज्ञान ऐसा कभी नहीं कर सकेगा। मैं इसके कुछ कारण बताऊँगा:

1. आत्मिक बातों का जो भी ज्ञान हम यहाँ रख सकते हैं, वह सादृश्य, या तुलना के द्वारा होता है।

यहाँ हमारे मन शरीर में बन्द हैं, और हम अपने सब विचार बाहरी वस्तुओं से, इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त करते हैं। अब, हम स्वयं इस रीति से आत्मिक या अनन्त बातों का इतना ज्ञान कभी प्राप्त नहीं कर सकते जो हमारी इच्छा को ठीक रीति से प्रभावित करने के लिये पर्याप्त हो। हमारी शारीरिक शक्तियाँ इसके लिये नहीं रची गई थीं। आत्मिक संसार के विषय में जो भी विचार हम रख सकते हैं, वे सादृश्य के द्वारा, या उन्हें अपने चारों ओर की वस्तुओं से तुलना करके होते हैं। यह आसानी से देखा जा सकता है कि इस रीति से हमारे मनों तक पहुँचाए गए सब विचार अत्यन्त अपूर्ण होने चाहिए, और कि अन्त में भी हम अपने मनों में सच्चा विचार नहीं पाते।

यहूदी प्रतिरूप सम्भवतः वे सबसे प्रबल साधन थे जिनका प्रयोग परमेश्वर उस समय यहूदियों को सुसमाचार का सही विचार देने के लिये कर सकता था। यह ध्यान में रखते हुए कि पूर्वी जातियाँ अपनी शिक्षा-दीक्षा के कारण किस प्रकार अलंकारों, और दृष्टान्तों, और प्रतिरूपों के प्रयोग की अभ्यस्त थीं, सम्भवतः प्रतिरूपों की प्रणाली ही वह सबसे प्रभावशाली और उपयुक्त रीति थी जो सत्य को उनके मनों तक अधिक सरलता से पहुँचाने के लिये, और उन्हें छुटकारे की योजना का ऐसा पूरा विचार देने के लिये सोची जा सकती थी, जैसा किसी अन्य रीति से नहीं दिया जा सकता था। और फिर भी यह प्रकट है कि जो विचार इस रीति से पहुँचाए गए, वे अत्यन्त अपूर्ण थे; और कि ईश्वरीय प्रकाश के बिना, जो उन्हें वास्तविकता को बिना सहायता की बुद्धि से कहीं अधिक पूरी रीति से दिखाता, वे इस रीति से कभी कोई प्रभावकारी ज्ञान प्राप्त न कर पाते।

इसी प्रकार शब्द केवल विचारों के चिह्न हैं। वे स्वयं विचार नहीं, परन्तु विचारों के प्रतिनिधि हैं। शब्दों के द्वारा विचारों को पहुँचाना प्रायः बहुत कठिन, और कभी-कभी असम्भव होता है। किसी छोटे बच्चे को लीजिए, और उससे बातें करने का प्रयत्न कीजिए, और देखिए कि बहुत से विषयों पर अपने विचारों को उसके छोटे से मन में बैठाना कितना कठिन है। इससे पहले कि आप शब्दों के द्वारा उस तक विचार पहुँचा सकें, उसे उन बातों का कुछ अनुभव होना चाहिए जिन्हें आप सिखाने का प्रयत्न कर रहे हैं।

मान लीजिए कि यह सारी मंडली अन्धी होती, और उसने कभी रंग न देखे होते। फिर मान लीजिए कि उस दीवार पर एक अत्यन्त भव्य और सुन्दर चित्र टँगा होता, और मैं उस विषय का पूर्ण ज्ञाता होता, और आपके सामने उसका वर्णन करने का बीड़ा उठाता। कोई भी भाषा, जिसका मैं प्रयोग कर सकता, आपको उस चित्र का ऐसा विचार न दे पाती कि आप अपने मनों में उसका चित्र बना सकें।

जहाँ किसी विषय पर, बात के स्वभाव के कारण, हमें आलंकारिक भाषा, सादृश्यों, और समानताओं का प्रयोग करने के लिये बाध्य होना पड़ता है, वहाँ जो ज्ञान हम पहुँचाते हैं वह अनिवार्य रूप से त्रुटिपूर्ण और अपर्याप्त होता है। आप में से किसने व्यक्तियों और स्थानों के ऐसे वर्णन नहीं सुने, कि आपने सोचा कि आपको उनका सही ज्ञान है; परन्तु जब आप उन्हें देखने आते हैं, तो पाते हैं कि आपको वास्तविकता का कोई सच्चा विचार था ही नहीं?

मान लीजिए कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे ग्रह से, जहाँ सब बातें उन सिद्धान्तों से बिलकुल विपरीत सिद्धान्तों पर बनी हैं जो यहाँ अपनाए गए हैं, इस संसार में आए। मान लीजिए कि वह यहाँ इतने समय तक रहे कि हमारी भाषा सीख ले, और फिर वह

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