व्याख्यान 107 (253 में से)

एक बार में मुट्ठी भर। अब जो व्यक्ति ऐसा करेगा, वह प्रकट करता है कि वह हृदय में जड़ तक सड़ा हुआ

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एक बार में मुट्ठी भर। अब जो व्यक्ति ऐसा करेगा, वह प्रकट करता है कि वह हृदय में जड़ तक सड़ा हुआ है।

इस प्रकार की एक घटना मेरी जानकारी में आई। एक व्यक्ति एक कमरे में बैठा था, जहाँ एक सज्जन ने किसी काम के लिए मेज़ पर दाखमधु का एक गिलास और पानी का एक जग रखा था।

उस सज्जन को एक क्षण के लिए कमरे से बाहर जाना पड़ा, परन्तु वह अनजाने में दरवाज़ा थोड़ा खुला छोड़ गया, और जब वह बाहर था, तो पीछे मुड़कर देखने पर उसने देखा कि इस व्यक्ति ने गिलास में से कुछ दाखमधु पी लिया, और फिर उसे छिपाने के लिए गिलास को पानी से भर दिया, और अपनी जगह जा बैठा। अब जिस व्यक्ति ने ऐसा किया, उसने दिखा दिया कि वह दाखमधु से प्रेम रखता था, और कि वह चोरी करने से ऊपर नहीं था; उसने दिखा दिया कि जहाँ तक सिद्धान्त का प्रश्न था, यदि उसके पास साधन होते तो वह मतवाला हो जाता, और यदि अवसर मिलता तो चोरी करता; वास्तव में, हृदय से वह पियक्कड़ और चोर दोनों था।

4. लोग प्रायः खोई हुई वस्तुएँ मिलने पर, विशेषकर कम मूल्य की वस्तुएँ मिलने पर, बड़ी बेईमानी प्रकट करते हैं। किसी को शायद एक जेबी चाकू, या पेंसिल का डिब्बा मिल जाता है, और वह ज़रा भी पूछताछ नहीं करता, उन लोगों के बीच भी नहीं जिनके विषय में उसे यह मानने का कारण है कि वस्तु उन्हीं की खोई है। अब, जो मनुष्य जेबी चाकू पाकर, जहाँ स्वामी के मिल जाने की कुछ भी सम्भावना हो, बिना पूछताछ किए उसे रख लेगा, वह, जहाँ तक सिद्धान्त का प्रश्न है, बैंक-नोटों से भरा बटुआ भी रख लेगा, यदि वह उसे मिल जाए और उसे छिपाने का उतना ही अवसर हो। और फिर भी यही व्यक्ति, यदि उसे पाँच हज़ार डॉलर वाला बटुआ मिल जाए, तो समाचार-पत्रों में उसका विज्ञापन देगा, और बड़ा शोर मचाएगा, और अद्भुत ईमानदार होने का दावा करेगा। परन्तु उसकी प्रेरणा क्या है? वह जानता है कि पाँच हज़ार डॉलर की पूछताछ होगी, और यदि यह पता चल गया कि उसने उसे छिपा लिया, तो वह बर्बाद हो जाएगा। वाह, क्या ईमानदारी है!

5. बहुत-से लोग हिसाब लगाने में, या रेज़गारी लौटाने में, अपने पक्ष में हुई छोटी-छोटी भूलों को छिपा लेते हैं। यदि कोई व्यक्ति, जब उसके पक्ष में ऐसी भूल हो जाए, चुप रहे, कुछ न कहे, और बात को जाने दे, तो यह स्पष्ट है कि केवल अवसर और दण्ड से बच निकलने की सम्भावना का अभाव ही उसे कोई भी अनुचित लाभ उठाने से, या किसी भी सीमा तक दूसरों को ठगने से, रोकता है।

6. डाकघर के साथ धोखाधड़ी भी इसी श्रेणी की है।

कौन नहीं जानता कि इसमें बहुत बेईमानी की जाती है? कुछ लोग सोचते हैं कि सरकार के थोड़े-से डाक-शुल्क को ठग लेने में कोई बेईमानी नहीं। पोस्टमास्टर ऐसे पत्रों को निःशुल्क-डाक की छाप (फ़्रैंक) लगाकर भेज देंगे जिनका उन्हें कोई अधिकार नहीं। बहुत-से लोग न केवल अपने परिवारों के लिए बल्कि अपने पड़ोसियों के लिए भी पत्र निःशुल्क भेज देंगे, जो सब क़ानून के सीधे विरुद्ध है, और डाकघर के साथ धोखा है। जो मनुष्य ऐसा करेगा, वह ईमानदार नहीं है।

ऐसा मनुष्य क्या कुछ न करेगा, यदि अन्य धोखाधड़ियों में भी उसे दण्ड से बच निकलने की वैसी ही आशा हो जैसी इसमें है?

7. तस्करी छोटी बेईमानी का एक आम रूप है। कितने ही मनुष्य जब इंग्लैण्ड से घर लौटते हैं, तो अपने सन्दूक़ में छोटी-छोटी वस्तुएँ चोरी-छिपे ले आने की युक्ति करेंगे, जिनके विषय में वे जानते हैं कि उन पर सीमा-शुल्क-गृह में शुल्क चुकाया जाना चाहिए, और वे इसे कुछ विशेष नहीं समझते, क्योंकि रक़म बहुत थोड़ी है; जबकि रक़म जितनी छोटी होती है, सिद्धान्त उतना ही स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। क्योंकि परीक्षा इतनी छोटी है, इसलिए इससे प्रकट होता है कि उस मनुष्य का ईमानदारी का सिद्धान्त कितना निर्बल है, जो ऐसी तुच्छ बात से हार जाता है। जो मनुष्य ऐसा करेगा, वह यदि उसे वैसा ही अवसर मिले, तो पूरे जहाज़ का माल चोरी-छिपे ले आएगा।

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