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राय देने को तैयार हूँ। और यदि इसके अर्थ के विषय में मुझे कोई सही समझ है, तो मुझे निश्चय है कि मैंने उसे परमेश्वर के आत्मा से पाया है।
1. मसीह किस अर्थ में हमारा ज्ञान है?
उसे प्रायः “परमेश्वर का ज्ञान” कहा गया है। और नीतिवचन की पुस्तक में उसे बुद्धि कहा गया है। परन्तु वह हमारे लिये ज्ञान कैसे ठहराया गया है?
इसमें निहित एक विचार यह है, कि हमें उसके ज्ञान के सारे लाभ पूर्ण रूप से प्राप्त हैं; और यदि हम जैसा चाहिए वैसा विश्वास करें, तो हम उसके द्वारा मार्गदर्शन पाने के विषय में उतने ही निश्चित हैं, और यह हर प्रकार से हमारे लिये उतना ही अच्छा है, मानो वही ज्ञान मूल रूप से हमारा अपना हो। नहीं तो यह सच नहीं हो सकता कि वह हमारे लिये ज्ञान ठहराया गया है। चूँकि वह ज्ञान का असीम स्रोत है, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि वह हमारे लिये ज्ञान ठहराया गया है, जब तक हम उसके ज्ञान के सहभागी न हों, और वह हमारे लिये सुनिश्चित न किया गया हो; ऐसा कि किसी भी समय, यदि हम उस पर भरोसा करें, तो हम उसे उतने ही निश्चय से, और जितनी भी मात्रा में हमें आवश्यकता हो, अचूक रूप से अपना मार्गदर्शन करने के लिये पा सकें, मानो वह मूल रूप से हमारा अपना हो? यही वह है जिसकी हमें सुसमाचार से आवश्यकता है, और जिसे सुसमाचार को हमारी आवश्यकताओं के अनुकूल होने के लिये देना ही चाहिए। और जिस मनुष्य ने यह नहीं सीखा, उसने जैसा जानना चाहिए वैसा कुछ भी नहीं जाना। यदि वह सोचता है कि उसका अपना सिद्धान्त गढ़ना और अटकलें लगाना उसे धर्म के विषय में कोई सही समझ तक पहुँचा देगा, तो वह अब तक कुछ भी नहीं जानता। उसका शारीरिक, सांसारिक हृदय धर्म की वास्तविकताओं को अध्ययन करके उनकी कोई काम की समझ उतनी ही कम पा सकता है जितनी किसी पशु का हृदय। “मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा जो उस में है?
वैसे ही परमेश्वर की बातें भी कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर का आत्मा।” बिना अनुभव के, हम परमेश्वर के चरित्र या आत्मा के विषय में क्या जान सकते हैं? क्या आप कहते हैं, “हम परमेश्वर के विषय में तर्क कर सकते हैं”? तो क्या हुआ यदि हम तर्क करें? यहाँ तर्क क्या कर सकता है?
मान लीजिए यहाँ एक ऐसा मन होता जो केवल शुद्ध बुद्धि ही होता, और जिसमें और कोई शक्तियाँ न होतीं, और मैं उस शुद्ध बुद्धि को यह सिखाने का बीड़ा उठाता कि प्रेम करना क्या है। मैं उस पर व्याख्यान दे सकता था, और उस शुद्ध बुद्धि को शब्दों की शिक्षा दे सकता था, ताकि वह प्रेम के विषय में तर्क और दार्शनिक चर्चा कर सके, फिर भी कोई भी देख सकता है कि उस शुद्ध बुद्धि को इस विचार का स्वामी बनाना असम्भव है कि प्रेम क्या है, जब तक उसमें न केवल प्रेम करने की शक्ति हो, बल्कि उसने वास्तव में प्रेम किया भी हो! यह ठीक ऐसा है मानो मैं किसी जन्म के अन्धे से रंगों की बात करूँ। वह शब्द सुनता है, परन्तु जब तक उसने देखा न हो, वह उससे क्या विचार जोड़ सकता है? रंगों के अन्तर का विचार उसके मन में बैठाना असम्भव है। वह शब्द केवल एक शब्द है।
धर्म में भी ठीक ऐसा ही है। जिसके मन ने उसका अनुभव नहीं किया, वह उस पर तर्क कर सकता है। वह परमेश्वर की सिद्धताओं को वैसे ही सिद्ध कर सकता है जैसे वह यूक्लिड के किसी प्रमेय को सिद्ध करता।
परन्तु जो सुसमाचार की आत्मा और जीवन है, वह बिना अनुभव के केवल शब्दों के द्वारा मन तक उससे अधिक नहीं पहुँचाया जा सकता, जितना शुद्ध बुद्धि तक प्रेम, या जन्म के अन्धे तक रंग।
आप उसे अक्षर तो इतना दे सकते हैं कि पाप के बोध से उसे कुचलकर नरक तक दबा दें; परन्तु परमेश्वर के आत्मा के बिना बातों का आत्मिक अर्थ देना उतना ही बेतुका है जितना किसी अन्धे को रंगों पर व्याख्यान देना।
