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अध्याय 14: स्वार्थ सच्चा धर्म नहीं है। वह अपनी भलाई नहीं चाहता। 1 कुरिन्थियों 13:5।
अर्थात्, उदार प्रेम, या मसीही प्रेम, अपनी भलाई नहीं चाहता।
जिस प्रस्ताव को मैं आज सन्ध्या को स्थापित करना चाहता हूँ, वह यह है:
कि अपनी प्रसन्नता का सर्वोच्च ध्यान रखना सच्चे धर्म से असंगत है।
यह प्रस्ताव स्वाभाविक रूप से उस श्रृंखला में पहला है जिसे समझाने के लिये मैं इन व्याख्यानों में परिश्रम करता रहा हूँ, और यदि मुझे पता होता कि अंगीकार करनेवाले मसीहियों की कोई उल्लेखनीय संख्या इस पर गम्भीरता से प्रश्न उठाती है, तो इसी पर सबसे पहले विचार किया जाता। परन्तु मैं ईमानदारी से कह सकता हूँ कि जब मैंने ये व्याख्यान आरम्भ किए, तब मुझे यहाँ किसी गम्भीर कठिनाई के आने की आशा नहीं थी; और इसलिये मैंने बहुत हद तक यह मान लिया कि स्वार्थ धर्म नहीं है। और इसी कारण, मैंने इस बात को प्रमाणित करने का केवल एक हल्का-सा प्रयत्न करके इसे छोड़ दिया।
परन्तु अब, क्योंकि मुझे पता चला है कि बहुत से अंगीकार करनेवाले मसीही यह मानते हैं कि अपनी प्रसन्नता का सर्वोच्च ध्यान रखना ही सच्चा धर्म है, इसलिये मैं इस विषय की और अधिक सावधानी से जाँच करना, और जिसे मैं सत्य समझता हूँ उसके पक्ष में आपके सामने तर्क रखना आवश्यक समझता हूँ। अपने प्रस्ताव को स्थापित करने में, मैं भिन्न-भिन्न बातों के बीच अन्तर करना चाहता हूँ; इसलिये मैं,
I. दिखाऊँगा कि इस प्रस्ताव से, कि अपनी प्रसन्नता का सर्वोच्च ध्यान रखना धर्म नहीं है, क्या अभिप्राय नहीं है। II. दिखाऊँगा कि इससे क्या अभिप्राय है। III. इसे प्रमाणित करने का प्रयत्न करूँगा।
I. मुझे यह समझाना है कि इस प्रस्ताव से क्या अभिप्राय नहीं है।
1. विवाद का विषय यह नहीं है कि अपनी प्रसन्नता का कुछ भी ध्यान रखना उचित है या नहीं।
इसके विपरीत; यह स्वीकार किया जाता है और माना जाता है कि अन्य हितों के साथ तुलना में, उसके वास्तविक मूल्य के अनुसार, अपनी प्रसन्नता का उचित ध्यान रखना हमारे कर्तव्य का एक भाग है। परमेश्वर ने हमें आज्ञा दी है कि हम अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखें। यह स्पष्ट रूप से अपने आप से प्रेम करना, या अपनी प्रसन्नता का ध्यान रखना, उसी नियम के अनुसार कर्तव्य ठहराता है जिसके अनुसार हम दूसरों की प्रसन्नता का ध्यान रखते हैं।
2. प्रस्ताव यह नहीं है कि हमें अपने ऊपर प्रभाव डालनेवाली परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं और धमकियों का कुछ भी ध्यान नहीं रखना चाहिए। यह स्पष्ट रूप से ठीक है कि हम अपने हितों के सापेक्ष मूल्य के अनुसार, अपने ऊपर प्रभाव डालनेवाली परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं और बुराई की धमकियों का ध्यान रखें। परन्तु कौन नहीं देखता कि हमारे विरुद्ध दी गई धमकी उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है जितनी बहुत से व्यक्तियों के विरुद्ध दी गई धमकी। मान लीजिए एक व्यक्ति के रूप में आपके विरुद्ध बुराई की धमकी दी गई है। यह स्पष्ट रूप से उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है जितनी तब होती जब उसमें आपका परिवार भी सम्मिलित होता। फिर मान लीजिए कि वह सारी मंडली तक, या राज्य तक, या सारे राष्ट्र तक, या संसार तक फैली है। यहाँ यह देखना सहज है कि एक व्यक्ति की प्रसन्नता, यद्यपि बड़ी है, सर्वोच्च नहीं मानी जानी चाहिए।
मैं एक पादरी हूँ। मान लीजिए परमेश्वर मुझसे कहता है, “यदि तू अपना कर्तव्य नहीं करेगा, तो तू नरक में भेजा जाएगा।” यह एक बड़ी बुराई है, और मुझे इससे बचना चाहिए। परन्तु मान लीजिए वह कहता है, “यदि तेरे लोग अपना कर्तव्य नहीं करेंगे, तो वे सब नरक में भेजे जाएँगे; परन्तु यदि तू विश्वासयोग्यता से अपना कर्तव्य करेगा, तो सम्भवतः तू सारी मंडली को बचा लेगा।” क्या मेरे लिये यह ठीक है कि मैं अपने ऊपर आनेवाली बुराई के भय से उतना ही प्रभावित होऊँ, जितना सारी मंडली के नरक में भेजे जाने के भय से? स्पष्ट रूप से नहीं।
3. प्रश्न यह नहीं है कि हमें अपने सांसारिक हितों की अपेक्षा अपने अनन्त हितों को प्राथमिकता देकर उनके पीछे लगना चाहिए या नहीं। मैं स्वयं यह स्पष्ट रूप से मानता हूँ, और ऐसा ही
