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ठीक इसके विपरीत, आप परमेश्वर और मनुष्य के सच्चे मित्रों को दण्ड की अपेक्षा पाप से अधिक डरते हुए पाएँगे। उनके सामने यह प्रश्न नहीं होता कि “यदि मैं यह करूँ तो क्या मुझे दण्ड मिलेगा?” या, “यदि मैं यह करूँ, तो क्या परमेश्वर मुझे क्षमा करेगा?” बल्कि उनका प्रश्न वह होता है जो यूसुफ़ ने पूछा था, “सो भला, मैं ऐसी बड़ी दुष्टता करके परमेश्वर का अपराधी क्यों बनूँ?” यह थी परमेश्वर की सन्तान की आत्मा, जो दण्ड से अधिक पाप से डरती थी, और पाप से इतना डरती थी कि उसे दण्ड का विचार तक न आया।
इस वर्ग के लोग, जिनके विषय में मैं बोल रहा हूँ, अक्सर पाप में लिप्त हो जाते हैं यदि वे अपने आप को यह विश्वास दिला सकें कि परमेश्वर उन्हें क्षमा कर देगा, या जब वे सोचते हैं कि वे बाद में उसके लिए पश्चाताप कर सकते हैं। वे अक्सर इस प्रकार तर्क करते हैं: “अमुक पादरी ऐसा करता है;” या “अमुक प्राचीन या अंगीकार करनेवाला ऐसा करता है, तो मैं भी वैसा ही क्यों न करूँ?” इस कलीसिया के एक सदस्य के पास सब्त-पाठशाला में एक कक्षा थी; परन्तु यह देखकर कि दूसरे लोग कोई कक्षा नहीं लेते, उस व्यक्ति ने इस प्रकार तर्क किया: “मैं उनसे अधिक यह क्यों करूँ?” और इसलिए उसने वह कक्षा छोड़ दी। अंगीकार करनेवालों की इस पूरी श्रेणी की आत्मा यही है—“दूसरे लोग ऐसे-ऐसे काम किए बिना भी काम चला लेते हैं, तो मैं उनसे अच्छा बनने के लिए अपने आप को क्यों कष्ट दूँ?” वे पाप से नहीं, बल्कि दण्ड से डरते हैं। वे जानते हैं कि वे पाप करते हैं, परन्तु वे आशा करते हैं कि दण्ड से बच जाएँगे। कौन नहीं देख सकता कि यह परमेश्वर के सच्चे मित्रों की आत्मा के विपरीत है, जिनका सब कुछ अपने में समेट लेनेवाला उद्देश्य यह है कि पाप को, और सारे पाप को, संसार से निकाल दें? ऐसे लोग पाप करने से जितना डरते हैं, उसका आधा भी नरक से नहीं डरते।
17. वे अपने उद्धार के विषय में उससे भी अधिक चिन्ता अनुभव करते और प्रकट करते हैं, जितनी यदि सारा संसार नरक की ओर जा रहा होता तो करते।
ऐसा अंगीकार करनेवाला, यदि उसकी आशा डगमगाने लगे, तो चाहता है कि हर कोई ‘उसके’ लिए प्रार्थना में लग जाए, और बड़ा हंगामा मचाए, और सारी कलीसिया को हिला दे, जबकि वह अपने आस-पास के उन पापियों के लिए कुछ करने का कभी विचार तक नहीं करता जो निश्चय ही नरक के मार्ग पर हैं। वह दिखाता है कि उसका मन अपने आप में डूबा हुआ है, और उसका मुख्य अभिप्राय यह देखना नहीं कि वह कितनी भलाई कर सकता है।
18. उन्हें भलाई करने की अपेक्षा भलाई पाना अधिक प्रिय है।
आप जान सकते हैं कि ऐसे लोगों में सुसमाचार की आत्मा नहीं है। उन्होंने यीशु मसीह की उस आत्मा में कभी प्रवेश नहीं किया, जब उसने कहा, “लेने से देना धन्य है।”
जो व्यक्ति परमेश्वर और मनुष्य के प्रति सच्चे प्रेम से प्रेरित है, वह दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिए जो कुछ करता है उसमें उससे कहीं अधिक आनन्द पाता है, जितना वे पाते हैं जो उसके हाथ से भलाई पाते हैं। वह सचमुच परोपकारी है, और दया दिखाना उसके लिए सन्तोष की बात है, क्योंकि उसका मन उसी पर लगा है, और जब वह ऐसा कर पाता है, तो उसके मन पर एक पवित्र आनन्द छा जाता है, और वह उसका अत्यन्त आनन्द लेता है।
दूसरा वर्ग देने की अपेक्षा पाने को अधिक उत्सुक रहता है। वे शिक्षा देने की अपेक्षा शिक्षा पाना अधिक चाहते हैं। वे सान्त्वना पाना चाहते हैं, परन्तु दूसरों को सुसमाचार की सान्त्वनाएँ देने के लिए अपने आप का इन्कार करने को कभी तैयार नहीं होते। यह सुसमाचार की फैलकर बाँटनेवाली आत्मा के कितना सीधा विपरीत है, इसे कोई भी एक ही दृष्टि में देख सकता है। वह आत्मा दूसरों को आनन्द बाँटने में अपना सर्वोच्च आनन्द पाती है। परन्तु इस वर्ग के लोग चाहते हैं कि हर किसी को
