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बहुत-से मनुष्य जो घर पर संयमी रहते हैं, जब दूर पहुँच जाते हैं, तो भोजन की मेज़ पर ब्रांडी और पानी का अपना गिलास एक ही घूँट में चढ़ा जाएँगे, या किसी भाप-जहाज़ के मदिरा-काउंटर पर जाकर बिना लज्जा के शराब माँगेंगे; या यदि वे यूरोप में हों, तो वे थिएटर चले जाएँगे। जब मैं भूमध्य सागर में, मेसीना में था, तो एक सज्जन ने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसके साथ थिएटर चलूँगा।
“क्या! मैं थिएटर जाऊँ? एक पादरी थिएटर जाए?” “क्यों,” उसने कहा, “आप घर से दूर हैं, और किसी को पता नहीं चलेगा।” “परन्तु क्या परमेश्वर को पता नहीं चलेगा?” यह स्पष्ट था कि वह सोचता था कि यद्यपि मैं पादरी था, फिर भी जब मैं घर से दूर होता तो थिएटर जा सकता था। परमेश्वर को पता चले तो कोई बात नहीं, जब तक मनुष्यों को पता न चले। और उसके मन में यह विचार आया भी कैसे, सिवाय इसके कि उसने ऐसे पादरियों को देखा हो जो ठीक ऐसे ही काम करते थे?
5. इन व्यक्तियों के चरित्र का एक और प्रगटीकरण यह है कि वे गुप्त पाप में लिप्त रहते हैं।
अब मैं ऐसी बात के विषय में बोल रहा हूँ जिसके द्वारा आप अपने आप को पहचान सकते हैं। यदि आप गुप्त रूप से किसी भी पाप की अपने आप को छूट देते हैं, जब आप ऐसा कर सकते हैं कि किसी मनुष्य को उसका पता न चले, तो जान लीजिए कि परमेश्वर उसे देखता है, और उसने आपका नाम पहले ही लिख लिया है—कपटी।
आप परमेश्वर की दृष्टि में अपमान की अपेक्षा नश्वर मनुष्यों की दृष्टि में अपमान से अधिक डरते हैं। यदि आप परमेश्वर से सर्वोपरि प्रेम करते, तो आपके पापों का परमेश्वर को मालूम होने की तुलना में, आपके लिए यह छोटी बात होती कि कोई भी और हर कोई दूसरा उन्हें जान ले। यदि आपकी ऐसी किसी बात के लिए परीक्षा होती, तो आप पुकार उठते, “क्या! क्या मैं परमेश्वर की आँखों के सामने पाप करूँ?”
6. वे गुप्त रूप से कर्तव्यों की ऐसी उपेक्षा करते हैं जिसे दूसरों पर प्रगट होने देने का वे साहस न करते।
हो सकता है कि वे कोई गुप्त पाप न करते हों, या उन गुप्त अशुद्धताओं में लिप्त न होते हों जिनकी चर्चा की जाती है, परन्तु वे उन कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं जिनकी उपेक्षा यदि उनके विषय में मालूम हो जाती, तो वह उनके मसीही चरित्र के लिए अपमानजनक समझी जाती। जैसे उदाहरण के लिए, गुप्त प्रार्थना। वे प्रभु-भोज में जाएँगे—हाँ, प्रभु-भोज में!—और सब्त के दिन बड़े भक्त दिखाई देंगे, फिर भी व्यक्तिगत भक्ति के विषय में वे कुछ नहीं जानते। प्रार्थना की उनकी कोठरी को न परमेश्वर जानता है और न मनुष्य। यह देखना आसान है कि प्रतिष्ठा उनकी मूर्ति है। वे परमेश्वर को अप्रसन्न करने से अधिक अपनी प्रतिष्ठा खोने से डरते हैं।
आपकी क्या दशा है? क्या यह सच है कि आप उन गुप्त कर्तव्यों को आदतन छोड़ देते हैं, और अपने निजी कर्तव्यों की अपेक्षा सार्वजनिक कर्तव्यों को पूरा करने में अधिक सावधान रहते हैं? तो फिर आपका चरित्र क्या है?
क्या यह आपको बताना पड़ेगा? “मनुष्यों की प्रशंसा उनको परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती थी।”
7. इस वर्ग के लोगों का विवेक सुसमाचार के सिद्धान्तों से भिन्न सिद्धान्तों पर बना हुआ प्रतीत होता है।
उन बातों में, जो लोकप्रिय हैं, उनका विवेक काम करता प्रतीत होता है, और उन बातों में जिनकी जनमत माँग नहीं करता, उनका कोई विवेक ही नहीं होता। आप उन्हें उनका कर्तव्य चाहे कितना ही स्पष्ट रूप से प्रचार करें, और चाहे कितनी ही स्पष्टता से उसे सिद्ध करें, और यहाँ तक कि उनसे यह स्वीकार भी करवा लें कि यह उनका कर्तव्य है, फिर भी जब तक जनमत उसकी माँग नहीं करता, और यह प्रतिष्ठा का विषय नहीं है, वे पहले की तरह उसी मार्ग पर चलते रहेंगे। उन्हें “यहोवा यों कहता है” दिखाइए, और उन्हें यह दिखा दीजिए कि उनका मार्ग मसीही सिद्धता से स्पष्ट रूप से मेल नहीं खाता, और
