व्याख्यान 70 (253 में से)

जनमत के सामने विरोध में जाती है। और वे किसी भी मनुष्य को या किसी भी बात को अविवेकी या उतावला ठहराने के लिए तैयार रहते हैं

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जनमत के सामने विरोध में जाती है। और जो कोई मनुष्य या कोई भी बात जनमत की धारा को रोकने और उसे दूसरी ओर मोड़ने के लिए आगे बढ़ती है, उसे वे अविवेकी या उतावला ठहराने के लिए तैयार रहते हैं।

टिप्पणियाँ 1. लोगों के लिए अपने पापों का श्रेय लेना, और अपने आप को यह विश्वास दिला लेना सहज है कि कुछ बातें भक्ति के काम हैं, जबकि वास्तव में वे केवल कपट के काम होती हैं।

वे वे काम करते हैं जो बाहरी रूप से भक्ति से सम्बन्ध रखते हैं, और अपने आप को भक्त होने का श्रेय दे देते हैं, जबकि उनके उद्देश्य सब के सब भ्रष्ट और खोखले होते हैं, और उनमें से एक भी परमेश्वर के अधिकार के प्रति सर्वोच्च आदर से उत्पन्न नहीं होता। यह इस बात से प्रकट है कि वे केवल वही करते हैं जहाँ परमेश्वर की माँगों के पीछे जनमत का समर्थन होता है। जब तक आप अपना सारा कर्तव्य पूरा करने और हर बात में आज्ञा मानने का लक्ष्य न रखें, तब तक जिस भक्ति का आप श्रेय लेते हैं वह केवल कपट है, और वास्तव में परमेश्वर के विरुद्ध पाप है।

2. कलीसिया में जितनी वास्तविक भक्ति है, उससे कहीं अधिक दिखावटी भक्ति है।

बहुत-सी बातें ऐसी हैं जिन्हें पापी अच्छा समझते हैं, परन्तु जो परमेश्वर की दृष्टि में घृणित हैं।

4. यदि प्रतिष्ठा का प्रेम और अपमान का भय न होता, तो कलीसिया में कितने ही ऐसे लोग हैं जो खुले धर्मत्याग में फूट पड़ते।

यहाँ कितने ऐसे हैं, जो जानते हैं कि यदि जनमत के अंकुश, अपमान के भय, और सद्गुण का श्रेय पाने की इच्छा न होती, तो आप खुले दुराचार में फूट पड़ते? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के अधिकार का आदर करने के कारण सदाचारी होता है, चाहे जनमत उसके पक्ष में हो या उस पर भौंहें चढ़ाए, तो वही सच्ची भक्ति है। यदि ऐसा नहीं है, तो वे अपना प्रतिफल पा चुके।

वे यह मनुष्यों की दृष्टि में श्रेय पाने के लिए करते हैं, और वह उन्हें मिल जाता है। परन्तु यदि वे परमेश्वर के हाथ से किसी अनुग्रह की आशा रखते हैं, तो वे निश्चय ही निराश होंगे। ऐसे स्वार्थी कपटियों को वह केवल यही प्रतिफल देगा कि वे दण्ड की आज्ञा पाएँ।

और अब मैं जानना चाहता हूँ कि आप में से कितने यह ठान लेंगे कि जनमत चाहे जैसा भी हो, आप परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अपना कर्तव्य, और अपना सारा कर्तव्य पूरा करेंगे? आप में से कौन इस बात के लिए सहमत होगा कि वह बाइबल को अपना नियम, और यीशु मसीह को अपना आदर्श मानेगा, और मनुष्य चाहे जो कहे या सोचे, हर दशा में वही करेगा जो उचित है? हर वह व्यक्ति जो इस आधार पर खड़ा होने को तैयार नहीं है, उसे अपने आप को परमेश्वर के अनुग्रह से अनजान समझना चाहिए। वह किसी भी रीति से धर्मी ठहराए जाने की दशा में नहीं है।

यदि उसने यह ठान नहीं लिया है कि जनमत चाहे जैसा भी हो, वह वही करेगा जिसे वह उचित जानता है, तो यह इस बात का पक्का प्रमाण है कि वह परमेश्वर की प्रशंसा से बढ़कर मनुष्यों की प्रशंसा से प्रेम रखता है।

और मैं यहाँ उपस्थित पश्चाताप न करनेवाले पापियों से कहना चाहता हूँ। आप देखते हैं कि मसीही होने का अर्थ क्या है।

इसका अर्थ है सब बातों में परमेश्वर के अधिकार से संचालित होना, न कि जनमत से; आशाओं और भयों के सहारे नहीं, परन्तु अपने आप को परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च रूप से समर्पित करके जीना। आप देखते हैं कि यदि आप धार्मिक बनना चाहते हैं, तो आपको पहले उसकी लागत का हिसाब लगाना होगा। मैं आपकी चापलूसी नहीं करूँगा। मैं सत्य को छिपाकर आपको धार्मिक बनने के लिए फुसलाने का प्रयत्न कभी नहीं करूँगा। यदि आप मसीही बनना चाहते हैं,

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