यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
उसके प्रति सच्चा समर्पण न हो। सच्चे समर्पण में दो बातें सम्मिलित हैं, जिन पर मैं चाहता हूँ कि आप विशेष ध्यान दें।
(1.)पहली बात यह है कि परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था में सच्ची सहमति में वास्तविक आज्ञाकारिता सम्मिलित है।
किसी बालक का अपने पिता की आज्ञाओं में वास्तविक सहमति का दावा करना व्यर्थ है, जब तक वह सचमुच उनका पालन न करे। किसी नागरिक का देश के कानूनों में सहमति का दावा करना व्यर्थ है, जब तक वह उन कानूनों का पालन न करे।
(2.)समर्पण की मुख्य बात उस वस्तु को छोड़ देना है जो विवाद का सबसे बड़ा विषय है। और वह यह है; कि मनुष्यों ने अपना सर्वोच्च प्रेम परमेश्वर और उसके राज्य से हटा लिया है, और स्वार्थ-हित को अपने ध्यान का सर्वोपरि विषय बना लिया है। जैसा परमेश्वर चाहता है, भलाई करने में अपने आप को लगा देने के बदले, उन्होंने यह सूत्र अपना लिया है कि “परोपकार घर से आरम्भ होता है।” परमेश्वर और पापी के बीच ठीक यही विवाद का विषय है। पापी अपने सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में अपने ही हित को बढ़ाने का लक्ष्य रखता है। अब, समर्पण में निहित पहली बात इसी विषय को छोड़ देना है। हमें अपने हित को सर्वोच्च रखना छोड़ देना चाहिए, और परमेश्वर और उसके राज्य के हितों को अपने प्रेम में अपने हितों से ठीक उतना ही ऊपर उठने देना चाहिए जितना उनका वास्तविक मूल्य अधिक है। जो मनुष्य ऐसा नहीं करता वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही है।
मान लीजिए कि कोई लौकिक शासक अपने राष्ट्र की सामान्य प्रसन्नता को बढ़ाने में लग जाए; और इस उद्देश्य के लिये बुद्धिमानी से उपयुक्त नियम बनाए, और अपने सारे साधन इसी उद्देश्य में लगा दे; और फिर वह अपनी हर प्रजा से यही माँग करे। फिर मान लीजिए कि कोई व्यक्ति जाकर सामान्य हित के विरोध में अपना निजी हित खड़ा कर दे। वह शासन के विरुद्ध, और उस सारे हित के विरुद्ध जिसे बढ़ाने के लिये शासन स्थापित है, विद्रोही है। तब उस विद्रोही की ओर से समर्पण की पहली बात यह है कि वह उस बात को छोड़ दे, और सार्वजनिक भलाई को बढ़ाने में शासक और आज्ञाकारी प्रजा के साथ मिल जाए।
अब परमेश्वर की व्यवस्था पूर्ण रूप से यह माँग करती है कि आप अपनी प्रसन्नता को परमेश्वर की महिमा और विश्व की भलाई के आधीन रखें। और जब तक आप ऐसा नहीं करते, आप परमेश्वर और विश्व के शत्रु, और नरक की सन्तान हैं।
और सुसमाचार भी वही माँग करता है जो व्यवस्था करती है। यह आश्चर्य की बात है कि पिछले कुछ वर्षों में बहुतों ने यह मत रखा है कि मनुष्य के लिये सीधे अपने ही उद्धार को लक्ष्य बनाना, और अपनी प्रसन्नता को अपनी खोज का बड़ा विषय बनाना ठीक है। परन्तु यह स्पष्ट है कि परमेश्वर की व्यवस्था इससे भिन्न है, और हर एक से माँग करती है कि वह परमेश्वर के हित को सर्वोपरि मूल्यवान समझे। और सुसमाचार भी व्यवस्था के समान वही माँग करता है। नहीं तो, यीशु मसीह पाप का सेवक है, और परमेश्वर के शासन के विरुद्ध हथियार उठाने के लिये संसार में आया।
बाइबल से यह दिखाना सहज है कि सुसमाचार भी, व्यवस्था के समान, निःस्वार्थ परोपकार, अर्थात् परमेश्वर से प्रेम और मनुष्य से प्रेम की माँग करता है। पहला वचन जो मैं उद्धृत करूँगा वह यह है, “पहिले परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो।” इसका क्या अर्थ है? चाहे यह कितना ही विचित्र लगे, एक लेखक ने हाल ही में इसी पद को यह प्रमाणित करने के लिये उद्धृत किया है कि पहले अपने ही उद्धार, या अपनी ही प्रसन्नता की खोज करना, और उसे अपनी खोज का प्रमुख विषय बनाना ठीक है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है। यह हर एक से माँग करता है कि वह परमेश्वर के राज्य की उन्नति को अपना
