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इस विषय पर जो कुछ कहा गया है, और इस प्रश्न पर जो सारा प्रकाश डाला गया है, उस सबके बाद, क्या इस देश में कोई भी ऐसा जीवित मनुष्य है जो कह सके कि उसे इस व्यवसाय के उचित होने पर सन्देह करने का कोई कारण दिखाई नहीं देता? कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि ऐसा कोई ईमानदार मन नहीं हो सकता जो इस पर सन्देह करने को विवश न हो जाए। वास्तव में हम तो यह मानते हैं कि ऐसा कोई ईमानदार मन नहीं जो यह न जानता हो कि यह अनुचित और अपराधपूर्ण है। परन्तु शराब बनानेवाले या उसे बेचनेवाले के विषय में सबसे उदार से उदार अनुमान लगा लीजिए, और मान लीजिए कि उसे इसके अनुचित होने का पूरा निश्चय नहीं है।
हम कहते हैं कि कम से कम उसे इसके उचित होने पर सन्देह तो अवश्य होगा। तब उसे क्या करना चाहिए? क्या वह प्रकाश की ओर से अपनी आँखें मूँद ले, और सत्य की परवाह किए बिना, जब तक वह उसे देखने से बचा रह सके, तब तक आगे बढ़ता जाए?
नहीं। वह जितना चाहे उतने कुतर्क कर सकता है और आपत्तियाँ उठा सकता है, परन्तु वह जानता है कि उसे अपने व्यवसाय के उचित होने पर सन्देह है; और यदि उसे सन्देह है, और फिर भी वह यह देखने और जाँचने का कष्ट उठाए बिना कि ठीक क्या है, उसे करता रहता है, तो वह उतने ही निश्चित रूप से दण्ड पाएगा मानो वह जान-बूझकर आगे बढ़ा हो। आप इन लोगों को यह कहते सुनते हैं, “अजी, मुझे अपने मन में पूरा निश्चय नहीं है कि बाइबल तेज़ शराब बनाने या बेचने को मना करती है।” अच्छा, मान लीजिए कि आपको पूरा निश्चय नहीं है, मान लीजिए कि आपकी सारी सम्भव और कल्पनीय आपत्तियाँ और कुतर्क दूर नहीं हुए, तो फिर क्या? आप जानते हैं कि आपको इसके उचित होने पर सन्देह है। और आपको गलत काम करने का दोषी ठहराने के लिए इससे आगे जाने की आवश्यकता नहीं है। यदि आपको इसके उचित होने पर सन्देह है, और फिर भी आप इसे करते रहते हैं, तो आप नरक के मार्ग पर हैं।
2. इसी प्रकार जहाँ कोई व्यक्ति ऐसे काम-धन्धे में लगा है जिसके कारण उसे सब्त को तोड़ना पड़ता है।
जैसे, सब्त के दिन खुलनेवाले डाकघर में, या किसी टोल-फाटक पर, या किसी भाप-नौका में काम करना, या कोई भी ऐसा दूसरा काम-धन्धा जो आवश्यकता का काम न हो। सब्त के दिन कुछ काम सदा ऐसे होते हैं जिन्हें करना ही पड़ता है; वे पूर्ण आवश्यकता के या दया के काम हैं।
परन्तु ऐसा मामला मान लीजिए जिसमें परिश्रम आवश्यक न हो, जैसे सब्त के दिन डाक ढोना, इत्यादि। कम से कम जो कहा जा सकता है, वह सबसे निचला आधार जिसे उदारता स्वयं भी मूर्ख बने बिना अपना सकती है, यह है कि ऐसे काम-धन्धे का उचित होना सन्दिग्ध है। और यदि वे इसे करते रहते हैं, तो वे पाप करते हैं, और नरक के मार्ग पर हैं। परमेश्वर ने उनके विरुद्ध अपनी व्यवस्था का दण्ड घोषित कर दिया है, और यदि वे पश्चाताप नहीं करते, तो उन्हें दण्ड भोगना ही होगा।
3. सब्त को तोड़नेवाली भाप-नौका और रेल कम्पनियों में, डाक-गाड़ियों (स्टेजकोच), नहर-नौकाओं इत्यादि में शेयर रखना।
क्या ऐसा कोई भी मालिक सच्चाई से कह सकता है कि उसे पूँजी के ऐसे निवेश के उचित होने पर सन्देह नहीं है? क्या उदारता इससे भी नीचे झुक सकती है कि वह इतना कहे कि उस मनुष्य को इस बात पर गहरा सन्देह अवश्य होगा कि ऐसा परिश्रम आवश्यकता का या दया का काम है या नहीं? इस मामले में यह प्रमाणित करना आवश्यक नहीं कि यह अनुचित है, यद्यपि यह पूरी तरह प्रमाणित किया जा सकता है, बल्कि केवल इतना प्रकाश दिखाना पर्याप्त है जिससे इसके उचित होने पर सन्देह उत्पन्न हो। तब यदि वह उस सन्देह का समाधान किए बिना इसे करता रहता है, तो वह दोषी ठहरता है और नाश हो जाता है।
4. यही बातें हर प्रकार के लॉटरी-जुए पर भी लागू होती हैं। उसे सन्देह है।
