व्याख्यान 81 (253 में से)

सफलता की किसी आशा के साथ ऐसे चरित्रवाले व्यक्ति को कभी उम्मीदवार नहीं बना सकता। परन्तु वर्तमान व्यवस्था में, जहाँ

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सफलता की किसी आशा के साथ ऐसे चरित्रवाले व्यक्ति को कभी उम्मीदवार नहीं बना सकता। परन्तु वर्तमान व्यवस्था में, जहाँ मनुष्य कानूनों को लागू किए बिना छोड़ देंगे, और भीड़ के उपद्रवों को, या भीड़ द्वारा की जानेवाली हत्याओं को, या डाक की लूट को, या किसी भी और बात को खुली छूट दे देंगे, केवल इसलिए कि वे अपने उम्मीदवार को जिता सकें जो उन्हें पद दिलाएगा, वहाँ जो कोई ऐसा करेगा वह बेईमान मनुष्य है, चाहे वह धर्म का अंगीकार करनेवाला हो या न हो। और क्या कोई मसीही ऐसा करके भी निर्दोष रह सकता है?

3. राजनीति में संसार के साथ जुड़कर मसीही परमेश्वर के आत्मा को शोकित करते हैं।

किसी भी मसीही राजनेता से पूछिए कि क्या वह कभी किसी राजनीतिक अभियान में परमेश्वर के आत्मा को अपने साथ लेकर गया? कभी नहीं। मेरी बात का यह अर्थ कदापि न समझा जाए कि मसीहियों को मत देने से, और सार्वजनिक मामलों में अपने उचित प्रभाव का उपयोग करने से इनकार करना चाहिए। परन्तु उन्हें किसी दल के पीछे नहीं चलना चाहिए।

4. राजनीति के वर्तमान चलन के पीछे चलकर आप देश में सारे शासन और व्यवस्था की जड़ खोदने में अपनी सहायता दे रहे हैं।

कौन नहीं जानता कि यह महान राष्ट्र आज डगमगा रहा है और लड़खड़ा रहा है, क्योंकि कानून तोड़े जा रहे हैं और पैरों तले रौंदे जा रहे हैं, और कार्यपालिका की शक्ति कार्य करने से इनकार करती है या कार्य करने का साहस नहीं करती? या तो शासक अव्यवस्था को दबाना नहीं चाहता, या वह समय टालता है और शैतान को राज्य करने देता है।

और देश के सब भागों में, और सब दलों में ऐसा ही है। और क्या कोई मसीही अपने अंगीकार के अनुसार चलते हुए ऐसे मनुष्यों को पद के लिए मत दे सकता है?

5. आप पापियों के मार्ग में ठोकर रखते हैं।

जब पापी मसीही होने का अंगीकार करनेवालों को अपने उन राजनीतिक कामों में अपने साथ चलते देखते हैं, जिन्हें वे स्वयं बेईमान और भ्रष्ट जानते हैं, तो वे क्या सोचते हैं? वे कहते हैं, “हम जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं, हम पद के पीछे हैं, हमने ठान लिया है कि अपने दल को सत्ता में पहुँचाएँगे, हम अपने ही हित के पीछे लगे हैं; परन्तु ये मसीही तो किसी दूसरे और ऊँचे उद्देश्य के लिए जीने का अंगीकार करते हैं, और फिर भी ये यहाँ आ पहुँचते हैं, और हम में से बाकी लोगों के समान रोटियों और मछलियों के लिए उतने ही उत्सुक होकर हमारे साथ मिल जाते हैं।” उनके लिए इससे बड़ी ठोकर और क्या हो सकती है?

6. आप भक्तिहीनों के सामने यह प्रमाणित करते हैं कि मसीही होने का अंगीकार करनेवाले भी उसी आत्मा से प्रेरित हैं जिससे वे स्वयं।

कौन आश्चर्य कर सकता है कि संसार धर्म की वास्तविकता के विषय में अविश्वासी है? यदि वे स्वयं पवित्रशास्त्र में खोजकर यह नहीं सीखते कि धर्म क्या है, यदि वे मसीही होने का अंगीकार करनेवालों के जीवन में जो कुछ देखते हैं उसी से प्रमाण के नियमों के अनुसार चलते हैं, तो उन्हें अविश्वासी होना ही चाहिए। जहाँ तक यह प्रमाण जाता है, उन्हें यह निष्कर्ष निकालना ही चाहिए कि धर्म का अंगीकार करनेवाले स्वयं उस पर विश्वास नहीं करते। यही तथ्य है। मुझे स्वयं सन्देह है कि धर्म का अंगीकार करनेवालों का बड़ा भाग बाइबल पर विश्वास करता है।

7. जहाँ तक उनका प्रमाण जा सकता है, वे यह दिखाते हैं कि हृदय का कोई परिवर्तन होता ही नहीं।

वह क्या है? क्या वह महीने दो महीने में एक बार प्रभु-भोज की मेज़ पर जाना, और कभी-कभी प्रार्थना-सभा में जाना है? क्या यह हृदय का परिवर्तन है, जब वे उतनी ही उत्सुकता से छीना-झपटी में लगे रहते हैं

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