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5. अन्त में, यह सुसमाचार की शर्तों के प्रति समर्पण की माँग करता है। सुसमाचार की शर्तें हैं (1.) पश्चाताप, अर्थात् पाप के लिये हार्दिक शोक, परमेश्वर को न्यायी ठहराना और अपने ही विरुद्ध उसका पक्ष लेना।
(2.) विश्वास, अर्थात् परमेश्वर के प्रति पूर्ण भरोसा और निश्चय, ऐसा कि वह आपको बिना हिचकिचाहट अपने आप को, देह और प्राण सहित, और जो कुछ आपके पास है और जो कुछ आप हैं, उसके हाथ में सौंप देने की ओर ले जाए, ताकि वह आपके साथ वैसा करे जैसा उसे अच्छा लगे।
(3.) पवित्रता, या निःस्वार्थ परोपकार।
(4.) उद्धार को केवल शुद्ध अनुग्रह की बात मानकर ग्रहण करना, जिस पर न्याय के आधार पर आपका कोई अधिकार नहीं है।
(5.) मसीह को अपने मध्यस्थ और सहायक, अपने प्रायश्चित करनेवाले बलिदान, अपने शासक और शिक्षक के रूप में, और उन सब पदों में ग्रहण करना जिनमें वह परमेश्वर के वचन में आपके सामने प्रस्तुत किया गया है। संक्षेप में, आपको परमेश्वर के ठहराए हुए उद्धार के मार्ग में पूरी तरह सहमत होना है।
I. आप देखते हैं कि कलीसिया में इतनी झूठी आशाएँ क्यों हैं।
इसका कारण यह है कि बहुत से लोग व्यवस्था की आज्ञा माने बिना, उस बात को अपना लेते हैं जिसे वे सुसमाचार समझते हैं। वे व्यवस्था को भय से देखते हैं, और सुसमाचार को व्यवस्था से बच निकलने की एक योजना समझते हैं। ये प्रवृत्तियाँ मनुष्यों में सदा प्रकट होती रही हैं। एक वर्ग ऐसा है जो सुसमाचार को थामे रहता है और व्यवस्था को अस्वीकार करता है; और दूसरा वर्ग ऐसा है जो व्यवस्था को लेता है और सुसमाचार की उपेक्षा करता है। एन्टिनोमियन (व्यवस्था-विरोधी) लोग व्यवस्था से पूरी तरह छुटकारा पाने की सोचते हैं। वे समझते हैं कि सुसमाचार का जीवन-नियम व्यवस्था से भिन्न है; जबकि सच्चाई यह है कि दोनों में जीवन का नियम एक ही है, और दोनों निःस्वार्थ परोपकार की माँग करते हैं। अब, यदि कोई व्यक्ति यह सोचता है कि सुसमाचार के अधीन वह परमेश्वर की महिमा को अपने सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में छोड़ सकता है, और परमेश्वर से अपने सारे मन, और प्राण, और शक्ति से प्रेम करने के बदले, अपने ही उद्धार को अपना सर्वोच्च लक्ष्य बना सकता है, तो उसकी आशाएँ झूठी हैं। उसने एक दूसरे सुसमाचार को अपना लिया है जो सुसमाचार है ही नहीं।
II. यह विषय दिखाता है कि हमें उस आम आपत्ति का सामना कैसे करना है, कि मसीह में विश्वास का अर्थ अपने ही उद्धार को अपना लक्ष्य या प्रेरणा बनाना है।
उत्तर। विश्वास क्या है? यह इस बात पर विश्वास करना नहीं है कि आप उद्धार पाएँगे, परन्तु परमेश्वर ने अपने पुत्र के विषय में जो वचन कहा है उस पर विश्वास करना है। कहीं भी यह प्रकट नहीं किया गया है कि आप उद्धार पाएँगे। उसने यह तथ्य प्रकट किया है कि यीशु मसीह पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया। जिसे आप विश्वास कहते हैं, वह अधिक ठीक रूप से आशा है। यह दृढ़ अपेक्षा कि आप उद्धार पाएँगे, विश्वास के कार्य से निकाला गया एक निष्कर्ष है; और ऐसा निष्कर्ष जिसे निकालने का आपको अधिकार है जब आप सचेत हैं कि आप व्यवस्था का पालन करते हैं और सुसमाचार पर विश्वास करते हैं। अर्थात्, जब आप वे भावनाएँ रखते हैं जिनकी माँग व्यवस्था और सुसमाचार में की गई है, तब आपको अपने उद्धार के लिये मसीह पर भरोसा करने का अधिकार है।
III. यह समझना भूल है कि सच्चे समर्पण के लिये दया से निराश होना आवश्यक है।
यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि सुसमाचार के अधीन हर कोई जानता है कि परमेश्वर की इच्छा यह है कि हर वह प्राणी उद्धार पाए जो निःस्वार्थ परोपकार का अभ्यास करेगा। मान लीजिए कोई मनुष्य
