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तो ईश्वरीय शिक्षा के बिना वे सिखाने के लिये उतने ही अयोग्य हैं, जितना सड़कों पर का सबसे अज्ञानी व्यक्ति खगोल-विद्या सिखाने के लिये अयोग्य है। मुझे डर है कि पादरियों और शिक्षकों, दोनों ने, साधारणतः इस ईश्वरीय शिक्षा की अपनी आवश्यकता को बहुत कम समझा है, और अपने उपदेशों और बाइबल-पाठों पर तब तक प्रार्थना करने की आवश्यकता का बहुत कम अनुभव किया है, जब तक कि उन्हें यह निश्चय न हो जाए कि परमेश्वर के आत्मा ने उनके मनों को परमेश्वर के वचन के सच्चे विचार से परिचित करा दिया है। यदि यह वैसे किया जाता जैसे किया जाना चाहिए, तो उनकी शिक्षाएँ उससे कहीं अधिक प्रभावशाली होतीं जितनी हम उन्हें अब देखते हैं।
आप, जो इस कलीसिया में बाइबल और सब्त-स्कूल की कक्षाओं के शिक्षक हैं, क्या इस पर विश्वास करते हैं? क्या आप विवेकपूर्वक और नियमित रूप से, हर पाठ का सच्चा विचार घुटनों पर खोजने के अभ्यस्त हैं? या आप किसी टीका के पास जाते हैं, और फिर आकर अपनी कक्षाओं में वह रूखा माल फेरी लगाकर बाँटते हैं जो आप टीकाओं और पुस्तकों से निकालते हैं, और आपकी शिक्षा में पवित्र आत्मा का कुछ भी अंश नहीं होता? यदि आप ऐसा करते हैं, तो मैं आपसे कहूँ, कि अच्छा होगा कि आप कोई और काम करें। यदि आप जानते कि कोई पादरी अपने पाठ-वचनों पर कभी प्रार्थना नहीं करता, तो आप उसके विषय में क्या कहते? तब तो आप बिलाम की गदही को ही पादरी बना सकते थे, और ऐसी दशा में वह अबोल पशु भी मनुष्य की बोली में बोलकर ऐसे मनुष्य के बावलेपन को डाँट सकता था। वह हृदय के गहरे सोतों तक पहुँचने के लिये उतनी ही प्रभावकारी शिक्षा दे सकती थी, जितनी ऐसा प्रचारक। अच्छा, तो अब, यह बात एक संडे-स्कूल शिक्षक के लिये भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी एक पादरी के लिये।
यदि आप अपने पाठ पर तब तक प्रार्थना नहीं करते जब तक आपको यह अनुभव न हो कि परमेश्वर ने आपको उसमें निहित विचार सिखा दिया है, तो सावधान! आप उस बात को धर्म के रूप में सिखाने का साहस कैसे करते हैं, जिसके विषय में आप ईमानदारी से यह नहीं मानते कि वह आपको परमेश्वर की ओर से सिखाई गई है?
VI. धर्मविज्ञान के विद्यार्थियों की यह एक बड़ी भूल है, जब वे सब महान शिक्षकों के मत, कलीसियाई पितरों और धर्माचार्यों के स्वर, और बाइबल के अर्थ के विषय में हर किसी का मत जानने के लिये तो अध्ययन करते हैं, परन्तु पवित्र आत्मा का मत नहीं।
संगमरमर जैसे ठंडे हृदयों के साथ, प्रकाश के स्रोत के पास सीधे जाने के बदले, वे जाकर विद्या की भूसी बटोरते हैं, और उसे धार्मिक शिक्षा के रूप में कलीसियाओं में फेरी लगाकर बाँटते हैं।
भयानक! जब तक वे ऐसा करते रहेंगे, हमें कभी प्रभावशाली सेवकाई प्राप्त न होगी। यह ठीक है कि वे परमेश्वर के वचन को समझने के लिये विद्या से जितनी सहायता ले सकें, लें। परन्तु पुस्तकीय विद्या से जो कुछ वे पाते हैं, उस पर उन्हें तब तक कभी सन्तुष्ट होकर नहीं रुक जाना चाहिए, जब तक उन्हें यह निश्चय न हो जाए कि परमेश्वर ने उन्हें ठीक उसी विचार से परिचित करा दिया है जिसे वह चाहता है कि वे ग्रहण करें।
मैंने अपनी देख-रेख में रहनेवाले धर्मविज्ञान के विद्यार्थियों पर यह छाप डालने का कठिन प्रयत्न किया है, और मेरा विश्वास है कि मैं कुछ हद तक सफल भी हुआ हूँ। और यदि मैंने ऐसा और अधिक किया होता, तो मुझे कोई सन्देह नहीं कि मैं और अच्छी सफलता पा सकता था। और मैं कह सकता हूँ, कि जब मैं धर्मविज्ञान का अध्ययन करता था, तो मैंने बहुत से घण्टे, और शायद मैं कह सकता हूँ कि सप्ताह, घुटनों पर बिताए, प्रायः बाइबल को अपने सामने रखे हुए, आत्मा के ठीक-ठीक आशय तक पहुँचने के लिये परिश्रम और प्रार्थना करते हुए। मैं यह घमण्ड से नहीं कहता, परन्तु एक तथ्य के रूप में, यह दिखाने के लिये कि यहाँ प्रस्तुत किया गया विचार मेरे लिये कोई नया मत नहीं है। और मैंने अपने पाठ-वचन और उपदेश सदा घुटनों पर ही पाए हैं। और फिर भी मैं जानता हूँ कि मैंने धर्म में उसकी तुलना में बहुत कम ज्ञान पाया है, जितना मैं पा सकता था, यदि मैंने प्रकाश के स्रोत को वैसे ठीक-ठीक थामा होता जैसे मुझे थामना चाहिए था।
