व्याख्यान 42 (253 में से)

मैं अपनी बात समझाता हूँ। प्रेम दो प्रकार का होता है: एक है परोपकार का प्रेम। यह

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मैं अपनी बात समझाता हूँ। प्रेम दो प्रकार का होता है: एक है परोपकार का प्रेम। यह उस व्यक्ति के चरित्र का कोई विचार नहीं करता जिससे प्रेम किया जाता है, बल्कि उस व्यक्ति को केवल ऐसे रूप में देखता है जो दुख और दुर्दशा के संकट में पड़ा है। परमेश्वर सब मनुष्यों के प्रति यह प्रेम रखता है। दूसरे प्रकार के प्रेम में चरित्र के प्रति सम्मान या उसकी स्वीकृति सम्मिलित होती है। परमेश्वर यह प्रेम केवल धर्मियों के प्रति रखता है। वह पापियों के प्रति यह प्रेम कभी नहीं रखता। वह उनसे असीम घृणा करता है। उसमें एक ही समय पर करुणा और घृणा दोनों असीम रूप से प्रबल होती हैं। मसीहियों में भी वही भावनाएँ होती हैं, केवल उसी मात्रा में नहीं, परन्तु वे उन्हें एक ही समय पर अनुभव करते हैं। सम्भवतः वे तब तक कभी सही अनुभव नहीं करते जब तक ये दोनों भावनाएँ एक ही समय पर उनमें सक्रिय न हों। मसीही व्यक्तियों के प्रति वैसा अनुभव नहीं करता जैसा परमेश्वर करता है, और न उन व्यक्तियों के वास्तविक चरित्र के अनुसार अनुभव करता है, जब तक कि ये दोनों भावनाएँ एक ही समय पर उसके मन में विद्यमान न हों। यह आप एक स्पष्ट विशेषता से देख सकते हैं।

मसीही उन्हीं लोगों को सबसे अधिक तीखेपन से और सबसे अधिक बार डाँटेगा जिनके लिए वह सबसे गहरी करुणा अनुभव करता है। क्या आपने यह कभी नहीं देखा?

क्या आपने कभी किसी माता-पिता को अपने बच्चे के लिए करुणा से व्याकुल होते, और आँसुओं के साथ उसे डाँटते नहीं देखा, और फिर भी ऐसे तीखेपन से कि वह नन्हा अपराधी उसकी डाँट के आगे सहम जाए।

यीशु मसीह ने अक्सर इन दोनों भावनाओं को प्रबलता से प्रकट किया। वह यरूशलेम पर रोया, और फिर भी वह इसका कारण ऐसे ढंग से बताता है जो उनके आचरण के विरुद्ध उसके धधकते हुए रोष को प्रकट करता है।

“हे यरूशलेम, हे यरूशलेम! तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पत्थरवाह करता है!” आह, जिस क्षण वह उन पर मँडराते हुए विनाश के लिए करुणा से रो रहा था, उसी क्षण उनकी दुष्टता का कितना पूरा दृश्य उसके सामने था।

मसीहियों के इस वर्ग के साथ भी ठीक ऐसा ही है। आप उनमें से किसी को भी किसी पापी से इस प्रकार बात करते नहीं पाएँगे कि वह केवल इसलिए रोए कि कोई उसके लिए रो रहा है। परन्तु उसकी कोमल विनतियों के साथ पाप के लिए कड़ी डाँट भी होती है।

मैं चाहता हूँ कि आप यह बात स्मरण रखें कि परमेश्वर और मनुष्य का सच्चा मित्र कभी पापी का पक्ष नहीं लेता, क्योंकि वह कभी केवल करुणा के वश होकर काम नहीं करता। और साथ ही, वह कभी पापी की निन्दा करते हुए ऐसे नहीं देखा जाता कि उसी समय उसके प्राण के लिए करुणा और उसे मृत्यु से बचाने की प्रबल इच्छा प्रकट न करे।

5. ऐसे मसीहियों का, मनुष्यों के साथ अपने सारे व्यवहार में, एक प्रमुख उद्देश्य यह होता है कि वे उन्हें परमेश्वर का मित्र बनाएँ।

चाहे वे बातचीत करें, या प्रार्थना करें, या जीवन के कर्तव्यों में लगे हों, उनका प्रमुख उद्देश्य यही होता है कि धर्म की सिफ़ारिश करें और हर एक को परमेश्वर की महिमा करने की ओर ले चलें। यदि वे परमेश्वर के सच्चे मित्र हैं, तो उनका ऐसा करना बिलकुल स्वाभाविक है। सरकार का सच्चा मित्र चाहता है कि हर कोई सरकार का मित्र हो। एक सच्चा और स्नेही पुत्र चाहता है कि हर कोई उसके पिता से प्रेम करे और उसका सम्मान करे। और यदि केवल एक भी व्यक्ति शत्रुता रखता हो, तो उसका निरन्तर लक्ष्य और प्रयत्न यही होता है कि उसका मेल करा दे। परमेश्वर के सच्चे मित्र से भी आप उसके चरित्र की एक प्रमुख विशेषता के रूप में यही आशा करेंगे कि वह पापियों का परमेश्वर से मेल कराना अपने जीवन का एक प्रमुख उद्देश्य बनाएगा।

अब मेरी बात पर ध्यान दीजिए! यदि यह आपके चरित्र की प्रमुख विशेषता नहीं है, यदि मनुष्यों का परमेश्वर से मेल कराना आपके विचार और प्रयत्न का सबको अपने में समेट लेनेवाला विषय नहीं है, तो मूल बात

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