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अपने स्वामी के हित के लिए और उसकी इच्छा के अनुसार त्याग देता है। क्या यह सच है कि कोई मनुष्य परमेश्वर की सेवा के प्रति सर्वोपरि रूप से समर्पित है, जब वह यह दिखाता है कि उसका अपना आराम और सुख उसे यीशु मसीह के राज्य से अधिक प्रिय है, और यह कि वह किसी कठोर आसन पर बैठने, या एक-दो घंटे के लिए अपने परिवार से अलग होने के बदले पापियों के उद्धार का बलिदान कर देना अधिक पसन्द करेगा?
6. वे लोग अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं जो अपना समय और धन, जब वे देते भी हैं, कुढ़ कुढ़कर, दबाव से देते हैं, न कि मन लगाकर और हर्षित हृदय से।
आप अपने सेवक के विषय में क्या सोचेंगे, यदि आपको अपने हित के लिए कुछ भी करवाने के लिए हर समय उसके पीछे पड़ना या उसे हाँकना पड़े? क्या आप यह न कहेंगे कि वह दिखावे के लिए सेवा करनेवाला है? कितने लोग ऐसे हैं जो धर्म के लिए जब कुछ करते भी हैं, तो कुढ़ कुढ़कर करते हैं। यदि वे कुछ करते हैं, तो वह उन पर भारी पड़ता है। यदि आप ऐसे किसी व्यक्ति के पास जाएँ, और किसी धार्मिक उद्देश्य के लिए उसका समय या उसका धन चाहें, तो उसे उसमें लगाना कठिन होता है। ऐसा लगता है कि यह उसके स्वभाव के विरुद्ध जाता है, और सहज या स्वाभाविक नहीं है। स्पष्ट है कि वह मसीह के राज्य के हितों को अपने हितों के समान नहीं समझता। वह प्रभु का भय मानने का दिखावा कर सकता है, परन्तु वह अपने किन्हीं दूसरे देवताओं की “सेवा” करता है।
7. जो लोग सदा यह पूछने को तैयार रहते हैं कि वे धर्म के लिए कितना कम कर सकते हैं, न कि कितना अधिक कर सकते हैं, वे अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं।
बहुत से लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर के लिए जो कुछ करते हैं, उसमें सदा यही पूछते प्रतीत होते हैं कि वे कितने कम से काम चला सकते हैं।
आप ऐसे मनुष्य को अपने लाभ और हानि का हिसाब बनाते सुनते हैं: “इस वर्ष इतना कमाया, फिर इतना दान-पुण्य में खर्च हुआ, इतना धर्म के लिए देने को बाध्य हुआ।” (धर्म के हितों के लिए देने को बाध्य!) “और इतना आग में गया, और इतना डूबे हुए कर्ज़ों में,” और इसी प्रकार आगे; क्या वह मनुष्य परमेश्वर की सेवा कर रहा है? यह एक सीधी सी सच्चाई है कि आपने संसार में धर्म को बढ़ाने के उद्देश्य पर अपना मन कभी लगाया ही नहीं। यदि लगाया होता, तो आप पूछते, मैं इस उद्देश्य के लिए और उस उद्देश्य के लिए कितना कर सकता हूँ? क्या मैं इतना, या इतना, या इतना नहीं कर सकता?
8. जो लोग अपने परिवारों को ऊँचा उठाने और उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए उनके लिए धन जमा कर रहे हैं, वे यहोवा की नहीं, बल्कि अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं।
जो लोग इस प्रकार अपने परिवारों के लिए धन जमा करके उन्हें एक भिन्न वर्ग में पहुँचाने का लक्ष्य रखते हैं, वे यह दिखाते हैं कि उनके पास इस संसार को यीशु मसीह के अधिकार के अधीन लाने के अतिरिक्त जीने के लिए कोई दूसरा उद्देश्य है। उनके पास सेवा करने के लिए दूसरे देवता हैं। वे प्रभु का भय मानने का दिखावा कर सकते हैं, परन्तु वे अपने देवताओं की “सेवा” करते हैं।
9. जो लोग इतनी सम्पत्ति जमा करने को अपना लक्ष्य बना रहे हैं कि वे काम-धन्धे से अवकाश लेकर आराम से जी सकें, वे अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं।
बहुत से लोग हैं जो परमेश्वर के सेवक होने का अंगीकार करते हैं, परन्तु उत्सुकता से सम्पत्ति बटोरने में लगे हैं, और यह हिसाब लगा रहे हैं कि कुछ समय बाद वे अपने देहाती निवास में जाकर आराम से रहेंगे। आपका क्या अर्थ है? क्या परमेश्वर ने आपको एक सदा के सब्त का अधिकार दिया है, जैसे ही
