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बुद्धिमान विश्व “निर्दोष” के निर्णय से गूँज उठेगा। यदि आपमें परमेश्वर की आज्ञा मानने की स्वाभाविक शक्ति नहीं है, तो उन्हें यही निर्णय देना पड़ेगा, नहीं तो वे विवेकशील प्राणी नहीं रहेंगे। क्योंकि बुद्धि का यह पहला नियम है कि किसी भी प्राणी को वह करने का अधिकार नहीं है जिसे करने की उसमें शक्ति नहीं है।
मान लीजिए कि परमेश्वर आपसे यह माँगे कि आपने जो कुछ किया है उसे अनकिया कर दें। हर कोई देखेगा कि यह एक स्वाभाविक असम्भवता है। अब, क्या ऐसा न करने के लिए आप दोषी हैं? परमेश्वर पिछले पापों का पश्चाताप माँगता है, यह नहीं कि आप उन्हें अनकिया कर दें। अब, मान लीजिए कि पहली जनवरी को आपका यह कर्तव्य था कि आप एक निश्चित व्यक्ति को चेतावनी दें, जो अब मर चुका है। क्या आप उस व्यक्ति को चेतावनी देने के लिए बाध्य हैं? नहीं। यह एक असम्भवता है। अब परमेश्वर केवल इतना ही माँग सकता है कि आप पश्चाताप करें। अब उस पापी को चेतावनी देना कभी आपका कर्तव्य नहीं हो सकता। परमेश्वर आपको इस बात के लिए उत्तरदायी ठहरा सकता है कि जब आपके वश में था, तब आपने उसके प्रति अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया। परन्तु जो करना आपके वश में नहीं है, उसे करना आपका कर्तव्य ठहराना बेतुकी बात होगी। यह पैरवी झूठी होने के कारण, और परमेश्वर पर अत्याचार का दोष डालने के कारण, अपराध को घोर रूप से और भी गम्भीर बना देती है। यदि परमेश्वर आपसे वह करने की माँग करता है जिसे करने की आपमें शक्ति नहीं है, तो यह अत्याचार है। और परमेश्वर जो कुछ माँगता है वह अनन्त मृत्यु के दण्ड के साथ माँगता है; वह उस काम को न करने के लिए, जिसे करने की आपमें शक्ति नहीं है, एक असीम दण्ड की धमकी देता है, और इस प्रकार वह एक असीम अत्याचारी ठहरता है। तो यह पैरवी परमेश्वर पर असीम अत्याचार का दोष लगाती है, और यह न केवल पापी को धर्मी ठहराने के लिए अपर्याप्त है, वरन् उसके अपराध को भयानक रूप से और भी गम्भीर बना देती है।
आइए, इस उदाहरण को थोड़ा बदलें, मान लीजिए कि परमेश्वर आपसे उस काम को न करने के लिए पश्चाताप करने की माँग करता है जिसे करने की स्वाभाविक योग्यता आपमें कभी थी ही नहीं। तब आपको या तो उस काम को न करने के लिए पश्चाताप करना होगा जिसे करने की स्वाभाविक शक्ति आपमें नहीं थी, या आपको नरक जाना होगा। अब, न तो आप इसके लिए पश्चाताप कर सकते हैं, और न ही वह आपसे इसका पश्चाताप करवा सकता है। पश्चाताप क्या है? यह अपने आप को दोषी ठहराना और परमेश्वर को धर्मी ठहराना है। परन्तु यदि आपमें शक्ति ही नहीं थी, तो आप इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते। यह एक स्वाभाविक असम्भवता है कि कोई विवेकशील प्राणी कभी अपने आप को उस काम को न करने के लिए दोषी ठहराए जिसके विषय में उसे बोध है कि उसे करने की शक्ति उसमें नहीं थी। न ही आप परमेश्वर को धर्मी ठहरा सकते हैं। जब तक मन के नियम उलट न दिए जाएँ, सब बुद्धिमान प्राणियों का निर्णय यही घोषित करेगा कि जिस काम को करने की शक्ति ही नहीं है, उसकी माँग करना असीम अत्याचार है।
मान लीजिए कि परमेश्वर आपसे लेखा माँगे, और आपसे न उड़ने के लिए पश्चाताप करने की माँग करे। वह किस प्रक्रिया से आपको न उड़ने के लिए अपने आप को दोषी ठहराने पर विवश कर सकता है, जबकि आपको बोध है कि आपके पंख नहीं हैं, और उड़ने की शक्ति नहीं है? यदि वह आपको छलकर इस विश्वास में डाल सके कि आपमें वह शक्ति थी, और आपसे एक झूठ पर विश्वास करवा दे, तब शायद आप पश्चाताप कर लें। परन्तु परमेश्वर का अपने प्राणियों के साथ ऐसा व्यवहार करना कैसी रीति होगी?
हे पापी, ऐसा बहाना लाने से आपका क्या अभिप्राय है? क्या आप यह मनवाना चाहते हैं कि आपने कभी पाप किया ही नहीं? आप कैसा विचित्र विरोधाभास करते हैं, जब आप यह स्वीकार करते हैं कि आपको पश्चाताप करना चाहिए, और अगली ही साँस में कहते हैं कि आपमें पश्चाताप करने की शक्ति नहीं है। आपको एक ओर या दूसरी ओर अपना पक्ष दृढ़ता से ले लेना चाहिए। यदि आप इस बहाने पर भरोसा करना चाहते हैं, तो उसे पूरी तरह खुलकर सामने रखिए, और परमेश्वर के न्यायासन के सामने अपना पक्ष लीजिए, और कहिए, “हे प्रभु, मैं बिलकुल भी पश्चाताप नहीं करने जा रहा;
मैं पश्चाताप करने के लिए किसी भी प्रकार बाध्य नहीं हूँ, क्योंकि मुझमें तेरी व्यवस्था मानने की शक्ति नहीं है, और इसलिए मैं पूरी तरह निर्दोष होने की पैरवी करता हूँ, क्योंकि मैंने कभी पाप किया ही नहीं!”
